फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

बदल जाएगी आरक्षण की पूरी बहस

चंद्र भान प्रसाद Published by: Raman Singh Updated Fri, 11 Jan 2019 07:05 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
संसद

जहां तक मुझे याद है, हाई स्कूल से लेकर अभी कुछ दिन पहले तक सवर्ण समाज के जो हमारे मित्र हैं, वे यही पूछते रहे हैं कि आरक्षण की वजह से क्या मेरिट का हनन नहीं होता है। शायद ही कोई अनुसूचित जाति के छात्र, कर्मचारी या अफसर, जिसने आरक्षण का लाभ लिया हो, उसे जीवन में ऐसे प्रश्नों का अनगिनत बार जवाब न देना पड़ा हो। यूनिवर्सिटी हो, कॉलेज हो या इंजीनियरिंग-मेडिकल कॉलेज-सभी जगह अनुसूचित जाति के छात्रों को कोटा बॉयज कहा जाता है। बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने आरक्षण को संरक्षण कहा था। उन्होंने इसे सिद्ध करने के लिए यह उदाहरण दिया कि किस तरह से 1854 में जब मैकाले की ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली लागू हुई, तो अनुसूचित जाति के बच्चों को भी स्कूलों में प्रवेश का अधिकार मिला। अनुसूचित जाति के बच्चों का दाखिला शुरू हुआ, लेकिन पूरे देश में उनके दाखिले के विरुद्ध दंगे शुरू हो गए। जगह-जगह उन्हें पीटकर खदेड़ दिया गया। कई जगह तो उनकी बस्तियों में आग लगा दी गई और धमकाया गया कि अगर अपने बच्चों को स्कूल भेजा, तो ऐसी ही सजा दी जाएगी। नतीजतन ब्रिटिश सरकार ने अनुसूचित जाति के बच्चों की सुरक्षा और स्कूलों में दाखिला दिलाने के लिए पुलिस तैनात की। फिर सवर्ण अभिभावकों ने अपने बच्चों को स्कूलों से निकाल लिया और स्कूल बंद करवा दिया। अनुसूचित जाति के बच्चों के साथ अपने बच्चों को पढ़ने देने के बजाय उन्होंने इसलिए स्कूल बंद करवाया, ताकि अनुसूचित जाति के बच्चे न पढ़ें, भले उनके अपने बच्चे भी अपढ़ क्यों न रह जाएं।



ब्रिटिश सरकार ने फिर एक आदेश जारी किया कि धर्म या जाति के आधार पर किसी भी बच्चे को दाखिला देने से स्कूल मना नहीं कर सकता है। इससे स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ, लेकिन जगह-जगह झगड़े चलते रहे। अंत में 1882 में डब्ल्यू डब्ल्यू हंटर की अध्यक्षता में इंडियन एजुकेशन पर एक कमीशन बना। उस समय अनुसूचित जाति को वंचित वर्ग कहा जाता था। हंटर कमीशन ने एक जगह लिखा है कि वंचित वर्ग के बच्चों के एडमिशन के खिलाफ जगह-जगह दंगे हो रहे हैं और ब्रिटिश सरकार के पास इतने सुरक्षा बल नहीं हैं कि उन्हें देश भर में तैनात किया जाए। जब इसी देश के लोग अपने ही देश के बच्चों को पढ़ने नहीं दे रहे हैं, तो बेहतर है कि वंचित वर्ग के बच्चों के लिए अलग-अलग स्कूल बना दिए जाएं। तो हंटर कमीशन के इस सुझाव के बाद ही अनुसूचित जाति के बच्चों के लिए अलग स्कूल खुले, जिनमें से कुछ अब भी चल रहे हैं।


डॉ आंबेडकर का कहना था कि चूंकि समाज अनुसूचित जाति को पढ़ने से रोकता है, इसलिए कानून बनाकर उनके लिए सीटें सुरक्षित की जाएं। उन्हें अछूत माना जाता है, भेदभाव किया जाता है, इसलिए नौकरियों में भी अनुसूचित जाति और जनजातियों का हिस्सा सुरक्षित कर दिया जाए। उनका कहना था कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोग सदियों से उपेक्षित, उत्पीड़ित रहे हैं, इसलिए उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था जरूरी है। हम लोगों ने खुद अपने जीवन में अनुभव किया है कि शिक्षा, नौकरी आदि में अनुसूचित जाति के लोगों के साथ भेदभाव होता है।

 

डॉ आंबेडकर ने भी कहा था और हमने भी अपने जीवन में देखा है कि अनुसूचित जाति को गरीबी के कारण नहीं, बल्कि अनुसूचित होने की वजह से प्रताड़ित किया जाता है। तीन-चार साल पहले प्रतापगढ़ में अनुसूचित जाति के दो सगे भाइयों ने आईआईटी की परीक्षा सामान्य कोटे में पास की। यह खबर अखबारों में छपी, तो तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उन्हें पुरस्कृत किया। जब वे लड़के अपने घर लौटे, तो शाम को उनके घर पर गांववालों ने पथराव किया। जुलाई, 2018 में अलीगढ़ के पास कासगंज में अनुसूचित जाति के एक दुल्हे को घोड़े पर चढ़कर विवाह करने जाने का सवर्णों ने विरोध किया। अंततः पुलिस और इलाहाबाद हाई कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। ऐसी घटनाएं अक्सर होती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए आरक्षण का जन्म हुआ।


अब इस देश के सामने एक नैतिक प्रश्न है कि जो सवर्ण समाज अभी तक आरक्षण का मखौल उड़ाता था, मेरिट का सवाल उठाता था, आरक्षण का लाभ लेने वालों को निकम्मा और अयोग्य ठहराता था, अब वह बताए कि मेरिट का क्या होगा। जो गरीब सवर्ण हैं, उन्हें क्या गरीबी की वजह से सामाजिक उत्पीड़न, भेदभाव और प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा? अगर गरीबी के कारण उनके बच्चों के साथ भेदभाव नहीं हुआ, तो फिर उनके लिए आरक्षण का क्या तुक बनता है। क्या गरीब सवर्णों के लड़कों को अपनी शादी में घोड़े पर चढ़ने या गरीब सवर्णों को सार्वजनिक नल से पानी लेने से कभी मना किया गया है? गरीबी बहुत खराब चीज होती है, चाहे किसी की भी हो, उसका निदान अवश्य होना चाहिए। लेकिन उसका निदान आरक्षण नहीं हो सकता, क्योंकि आरक्षण की व्यवस्था किसी और काम के लिए बनी है।


आर्थिक आधार पर दस फीसदी आरक्षण की व्यवस्था कर सरकार ने आरक्षण के सिद्धांत को ही सिर के बल खड़ा कर दिया है। ऐसा करके सरकार ने एक और खतरे का संकेत दिया है, जिसका सीधा असर अनुसूचित जाति और जनजाति पर पड़ने वाला है। कल भाजपा सरकार यह भी कह सकती है कि जो दो-तीन पीढ़ी से आरक्षण के लाभार्थी हैं, उनका आरक्षण खत्म कर दिया जाए। जब आंबेडकर से लोगों ने पूछा कि नौकरियां कम हैं, तो आरक्षण से कितने अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों का भला होगा, तो उन्होंने कहा था कि आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है, आरक्षण वंचित तबकों को सत्ता व्यवस्था में प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए भी बना है। आरक्षण से वंचित वर्गों में नए रोल मॉडल पैदा होंगे। आर्थिक आधार पर आरक्षण का तर्क आंबेडकर के सिद्धांत के विपरीत होगा। अब जबकि आर्थिक आरक्षण का विधेयक संसद से पारित हो गया है, तो सवर्ण समाज से पूछा जाना चाहिए कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति के साथ जो दुर्व्यवहार आज भी होता है, क्या उसे खत्म करने के लिए सवर्ण समाज का गरीब तबका वंचित समाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करेगा। और दूसरा, जो नैतिक सवाल है कि क्या अब सवर्णों में जो गरीब तबका है, अनुसूचित जाति और सवर्णों के बीच रिश्तेदारी शुरू करने के लिए आंदोलन चलाएगा। 

विज्ञापन
विज्ञापन
Next