एक समय वक्त गुजारने के लिए अंताक्षरी, ताश और दूसरे घरेलू खेलों का सहारा लिया जाता था। दूरदर्शन के आगमन के साथ इन चीजों में तब्दीली आने लगी और यह जुमला आम हो गया कि अब इतने काम हैं कि वक्त ही नहीं बचता। पर भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच हाल के वर्षों में खाली वक्त ने इतनी जोरदार वापसी की है कि देश-दुनिया की तमाम कंपनियां टाइमपास के हमारे शगल को भुनाने की कारोबारी कसरत में जुट गई हैं। इसमें ताजा सनसनी तमाशाई क्रिकेट के आला फॉर्मेट आईपीएल की इस साल की प्रायोजक बनी ऑनलाइन गेमिंग कंपनी ड्रीम-11 है।
टाइमपास उद्योग में इतने ज्यादा पैसे बनाने की क्षमता कहां से पैदा हो गई कि एक गेमिंग कंपनी आईपीएल के प्रायोजन के लिए 250 करोड़ रुपये फेंक दे। इस साल के आईपीएल की प्रायोजक एक चीनी मोबाइल हैंडसेट निर्माता कंपनी थी, जिसे लद्दाख में जारी गतिरोध के बीच हटना पड़ा। इसके बाद प्रायोजक बनने की होड़ में ऑनलाइन गेमिंग कंपनी ड्रीम-11 ने जिस तरह बाजी मारी, उससे साफ है कि हमारे टाइमपास का साज-ओ- सामान जुटाने वाली चीजों के लिए नया आसमान खुल गया है, जहां असीमित कमाई के मौके हैं। इस सबकी शुरुआत इंटरनेट के अभ्युदय और मोबाइल इंटरनेट के रूप में उसके विस्तार के साथ हुई है, जहां लोगों को मनचाहे वक्त, एकांत और बेहद कम कीमत पर खाली वक्त में मनोरंजन के साधन मिल गए हैं। जब दुनिया महामारी के शिकंजे में फंसी है और तमाम कारोबार लगभग ठहरे हुए हैं, तब ऑनलाइन गेमिंग और मनोरंजन उद्योग नए शिखर पर पहुंच गया है।
लॉकडाउन और अनलॉक के बीच जिन चीजों की मांग और जिन कंपनियों के व्यवसाय में वृद्धि हुई, उनमें सबसे अहम भूमिका उस मनोरंजन उद्योग की है, जिसे अब टाइमपास इंडस्ट्री भी कहा जाता है। लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों का व्यवसाय तेजी से बढ़ा। मार्केट डाटा सुपर ट्रैकर के आकलन के मुताबिक, विगत मार्च में ही लोगों ने डिजिटल वीडियो गेम्स खेलने और उन्हें डाउनलोड करने में 10 अरब डॉलर खर्च कर डाले थे। ऐसी ही स्थिति ऑनलाइन गेमिंग (जैसे पबजी), कंसोल गेमिंग और पर्सनल कंप्यूटर पर खेले जाने वाले गेम्स की रही, क्योंकि लॉकडाउन की शुरुआत में ही इनका व्यवसाय अरबों डॉलर तक बढ़ गया। स्मार्टफोन पर खेले जाने वाले ऑनलाइन गेम्स पर मार्च में दुनिया में 5.7 अरब डॉलर खर्च किए गए थे। इन खेलों के अलावा टाइमपास इंडस्ट्री में जिन चीजों पर सबसे ज्यादा दांव लगा है, उनमें रम्मी, कार्ड गेम, अपनी आईपीएल टीम बनाने और कार रेसिंग जैसे फ्रीमियम (फ्री+प्रीमियम) मॉडल पर चलने वाले गेम्स हैं।
ऐसे कई खेल शुरुआती चरणों पर मुफ्त उपलब्ध होते हैं, जबकि ज्यादा रोमांच का एहसास करने वाले दो फीसदी खिलाड़ी ऊंचे चरणों के लिए प्रीमियम का भुगतान करते हैं। यह दो फीसदी का आंकड़ा भी काफी आकर्षक है, क्योंकि इसी के बल पर ड्रीम-11 जैसी कंपनियां अरबों का कारोबार करने लगी हैं। व्यवसाय पर कब्जे की होड़ का ही नतीजा है कि हाल में पेटीएम से गूगल का विवाद हो गया। पेटीएम ने आईपीएल को भुनाने की कोशिश के तहत स्क्रैचकार्ड और कैशबैक का एक नया ऑफर ग्राहकों के लिए पेश किया था, जिसे गूगल ने अवैध बताते हुए पेटीएम को प्ले स्टोर से कुछ समय के लिए हटा दिया। टाइमपास इंडस्ट्री का एक विस्तार ओटीटी (ओवर द टॉप) कंटेंट का भी है, जिसके तहत स्मार्टफोन या स्मार्ट टीवी के जरिये फिल्में, वेब सीरीज आदि मुहैया कराई जाती हैं।
जब हमारा खाली वक्त पहले से ही फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, ट्विटर, स्नैपचैट, टिकटॉक या यूट्यूब से घिर चुका था, तब ऑनलाइन गेम्स, हॉटस्टार, नेटफ्लिक्स, अमेजॉन प्राइम जैसे ओटीटी मंचों को देने के लिए और वक्त कहां से आ गया? इसमें लोगों को होने वाली कमाई की भी भूमिका है। टिकटॉक के हमारे देश में 20 करोड़ यूजर थे, जो रोजाना इस पर अपने वीडियो डाल खुद कमाई का जरिया खोलते थे। हालांकि इंटरनेट कंपनियां उससे हजारों गुना ज्यादा कमाई करती हैं। टाइमपास इंडस्ट्री का खतरनाक पहलू यह है कि इसने न सिर्फ हमारी दिनचर्या में दखल दिया है, बल्कि आर्टिफशियल इंटेलिजेंस की बदौलत यह सोच-प्रक्रिया पर भी पकड़ बना रहा है।