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ईरान पर प्रतिबंध से उपजी चुनौती और भारत के हितों का सवाल

Avdhesh Kumar
Updated Wed, 08 May 2019 06:16 AM IST
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अवधेश कुमार
अमेरिका के ईरान से कच्चे तेल की खरीद पर लगी पाबंदी से मिली छूट दो मई को समाप्त करने के साथ ही चिंता के कई प्रश्न खड़े हो गए हैं। भारत अपनी आवश्यकता का करीब 83 प्रतिशत तेल आयात करता है। प्रतिबंध की घोषणा होने तक भारत कुल तेल आयात का लगभग 26 प्रतिशत ईरान से आयात करता था। हमारे लिए इराक एवं सऊदी अरब के बाद तीसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता ईरान ही रहा है।


अमेरिका का सीधा लक्ष्य ईरान के संपूर्ण निर्यात को बंद कराना है। अमेरिका का यह रुख कितना सही है और कितना गलत इस पर दो राय हो सकती है, पर इसके प्रभावों को लेकर नहीं। सरकार कह रही है कि आपूर्ति में संभावित कमी के मद्देनजर वैकल्पिक स्रोतों की तैयारी कर ली गई है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक और रूस ने भारत को हर तरह का सहयोग करने का आश्वासन दिया है।


सऊदी अरब एवं संयुक्त अरब अमीरात ईरान विरोधी देश हैं। वे अमेरिका के साथ हैं, इसलिए वे नहीं चाहेंगे कि भारत जैसा बड़ा तेल खरीदार किसी समस्या में फंसे। दोनों देशों से हमारे संबंध बेहतर हैं। इन सबके अलावा भविष्य को ध्यान में रखते हुए भारत ने पिछले कुछ सालों में कई कदम उठाए हैं। दूसरे देशों के साथ मिलकर कच्चे तेल की बड़े स्तर पर प्रसंस्करण के लिए रिफाइनरी स्थापित हो रही है। महाराष्ट्र के रत्नागिरी में ऐसा ही एक इंटीग्रेटेड रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स कॉम्प्लेक्स बनाया जा रहा है। यह रिफाइनरी हर दिन 12 लाख बैरल क्रूड ऑयल प्रोसेस करने की क्षमता रखेगी।


दूसरे देशों पर निर्भर रहने के अलावा अपने स्रोतों को मजबूत बनाने की नीति पर भी भारत काम कर रहा है। इस दिशा में सरकार ने कुछ नीतिगत बदलाव किए हैं। तेल निर्यात का अर्थव्यवस्था से सीधा संबंध होने के कारण और कई प्रश्न हमारे मन में हैं। इनमें सबसे पहला प्रश्न कीमत वृद्धि से जुड़ा है। अगर तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो महंगाई बढ़ेगी, रुपया लुढ़क सकता है, जिससे भारत को आयात के बदले ज्यादा पूंजी चुकानी होगी और शेयर बाजार भी नीचे आ सकता है, (हालांकि डॉलर में मजबूती से निर्यात में लाभ होगा) व्यापार घाटा, राजकोषीय घाटा तेजी से बढ़ेगा और कुल मिलाकर इससे विकास दर प्रभावित होगी। भारत या चीन जैसे देशों की विकास दर गिरने का असर पूरी दुनिया पर होगा। क्या तेल की कीमतों को स्थिर रखना संभव है? अमेरिकी छूट के अंत के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रहीं हैं। कच्चे तेल की कीमत पिछले छह महीनों के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच चुकी है। खाड़ी में तेल के बड़े उत्पादक देशों सऊदी अरब, इराक और संयुक्त अरब अमीरात ने आपूर्ति बढ़ाने का संकेत दिया है, ताकि कीमतों में कोई उछाल न आए।  


एक बड़ा प्रश्न ईरान के साथ संबंधों के भविष्य का भी है। भारत का ईरान के साथ सांस्कृतिक-राजनीतिक एवं आर्थिक संबंध काफी गहरे हैं। तेल की भूमिका इसमें छोटी है। भारत ईरान पर पूरी तरह प्रतिबंध के साथ नहीं जा सकता। भारत ने वहां काफी निवेश किया हुआ है। भारत ने वहां चाबहार बंदरगाह विकसित किया है, जिसके साथ सड़क एवं रेल मार्ग विकसित करने सहित कई परियोजनाओं पर काम कर रहा है। चीन से वहां हमारी सीधी प्रतिस्पर्धा है। वहीं अमेरिका भारत को द्विपक्षीय व्यापार में सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाला देश है। इसलिए उसके बिल्कुल विरुद्ध जाना भी घातक होगा। भारत के समक्ष इन दोनों के साथ संतुलन साधने की चुनौती है।
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