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खोट पुलिस प्रशिक्षण में है

तवलीन सिंह Updated Sun, 12 Nov 2017 06:57 PM IST
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तवलीन सिंह
अपनी बेटी की हत्या के लिए जेल में रहने के बाद हाल में आरुषि तलवार के माता-पिता को बाइज्जत रिहा किया गया और न्यायाधीशों ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि उनको निराधार दंडित किया गया था। पिछले सप्ताह सीबीआई ने रायन स्कूल के नन्हें प्रद्युम्न ठाकुर की हत्या की तहकीकात करने के बाद कहा कि जिस बस कंडक्टर को हरियाणा पुलिस ने गिरफ्तार करके जेल में डाला था, वह बेगुनाह है। हरियाणा की कानून-व्यवस्था विशेष तौर पर चर्चा में रही है पिछले दिनों। हम यह भूल ही गए हैं कि जो हाल पुलिस का हरियाणा में है, पुलिस व्यवस्था का वही हाल कमोबेश देश के हर राज्य में है।


महा परिवर्तन की जितनी आवश्यकता पुलिस विभाग को है, शायद ही किसी दूसरे सरकारी विभाग को होगी। ऐसा इसलिए कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और लोकतंत्र की ताकत कानून-व्यवस्था की ताकत पर ही निर्भर होती है। कानून-व्यवस्था को मजबूत या कमजोर करने की जिम्मेदारी पुलिस की होती है। अपने देश में जब भी पुलिस के नाकारेपन की चर्चा होती है, तब हमेशा कहा जाता है कि दोष पुलिस विभाग का नहीं है, बल्कि दोष राजनेताओं का है। पुलिस वालों के हमदर्द कहते हैं कि अगर पुलिस व्यवस्था में राजनेताओं का हस्तक्षेप न होता, तो भारतीय पुलिस उतनी ही अच्छी होती, जितनी विकसित पश्चिमी देशों की पुलिस होती है।


अफसोस कि इस झूठ को देश के कुछ बुद्धिजीवी और राजनीतिक पंडित भी सच मानते हैं। सच्चाई यह है कि अंग्रेजों ने हम भारतीयों को डंडों और गोलियों से पांव तले दबाकर रखने के लिए ऐसी पुलिस व्यवस्था बनाई थी। विकसित पश्चिमी देशों में हिसाब उल्टा है। वहां पुलिस वालों को सिखाया जाता है कि देश के आम नागरिकों के हित सुरक्षित रखना उनका प्रथम दायित्व है। हमारी सरकारों ने पुलिस प्रशिक्षण में परिवर्तन किया होता, तो शायद भारतीय पुलिस इतनी बदनाम न होती। उसके प्रशिक्षण में गंभीर कमियां हैं। इनमें सबसे बड़ी कमी शायद यह है कि आम पुलिस वाले को जांच करने के तरीके नहीं सिखाए जाते। मुझे पहली बार इसका एहसास एक अमेरिकी पत्रकार ने तब कराया, जब मुंबई में शृंखलाबद्ध विस्फोट हुए थे। हम दोनों दिल्ली से एक ही फ्लाइट में आए थे और जब तक मुंबई के स्टॉक एक्सचेंज तक पहुंचे, तब तक आधी रात हो चुकी थी। वहां पहुंचकर हमने देखा कि खंडहर हो चुके स्टॉक एक्सचेंज की इमारत में बड़ी संख्या में पुलिस के जवान घूम रहे थे। उनको देखकर मेरे अमेरिकी दोस्त ने हैरान होते हुए कहा, क्या कर रहे हैं ये लोग? क्या ये जानते नहीं कि सारे सुराग इस खंडहर में ही मिलने वाले हैं?


मैं उन्हें किस मुंह से कहती कि शायद उन्हें सिखाया ही नहीं गया है कि जहां विस्फोट होता है या किसी की हत्या होती है, वहां काफी फूंक-फूंककर चलना पड़ता है, ताकि तमाम सबूत पुलिस के जूतों के नीचे खत्म न हो जाएं? मैं उन्हें किस मुंह से कहती कि हमारी पुलिस को तहकीकात करने का एक ही तरीका सिखाया जाता है : पीट-पीटकर ‘सच’ उगलवाना! पुलिस प्रशिक्षण का जो हाल पहले था, वह आज भी है। आज भी पुलिस को तहकीकात के आधुनिक तरीके नहीं सिखाए जाते। वह इतना भी नहीं जानती कि सुराग अक्सर घटनास्थल पर ही मिलते हैं। प्रशिक्षण के अभाव के कारण बेगुनाह लोगों को अक्सर पकड़ा जाता है। अक्सर ये बेगुनाह बस कंडक्टर अशोक कुमार की तरह गरीब होते हैं, जिनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं होती। परिवर्तन कब आएगा, कौन जाने!
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