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इनका जुड़ना, उनका टूटना

Thu, 16 Apr 2015 08:58 PM IST
सहीराम
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जी, इधर जनता परिवार जुड़ रहा है और आप टूट रही है। यह वह वाला मामला नहीं है कि कोई जीता-कोई हारा। क्योंकि यहां तो जनता परिवार अगर हारा, तो भाजपा से हारा, और आप अगर जीती, तो भी भाजपा से ही जीती।
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पैदा होना और मरना जीवन की अनिवार्यता तो हो सकती है, पर राजनीति की यह कोई अनिवार्यता नहीं कि कोई जुड़ेगा, तो दूसरा टूटेगा जरूर। ऐसी अनिवार्यताएं नसीब के खेल में तो हो सकती हैं कि अगर राजा नसीब वाला हो गया, तो पता नहीं, क्यों प्रजा के हिस्से बदनसीबी ही आती है। पर राजनीति में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं होती।

कहते हैं कि हार के बाद टूट होती है, जीत के बाद तो जुड़ाव ही होता है। पर इधर तो उल्टा हो रहा है। दुनिया की रीत तो उल्टी हो सकती है, लोगों की खोपड़ी भी उल्टी हो सकती है, गंगा उल्टी बह सकती है, बांस उल्टे बरेली को भी जा सकते हैं, पर राजनीति के सिद्धांत कैसे उल्टे होंगे? जनता परिवार चुनाव में हारा तो देखो, अब जुड़ रहा है, और आप को इतनी जोरदार जीत मिली, फिर भी टूट रही है।
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वैसे टूटने के मामले में तो जनता परिवार ही बदनाम था। उसके बारे में लोग अक्सर यही गाना गुनगुनाया करते थे कि इस दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा। लोग यह भी कहा करते थे कि जनता परिवार तो अमीबा सिद्धांत पर विकसित होता और फलता-फूलता है। लेकिन देखो, आज वह कैसे एक हो रहा है! हालांकि जलकुकड़े यह भी कह सकते हैं कि यह टूटने के लिए ही एक हो रहा है। पर आप तो जुड़ने के लिए ही विख्यात थी। हर कोई उससे जुड़ रहा था। आप से जुड़ना एक क्रेज था। आप से जुड़ने का अर्थ था कि आप भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं। आप से जुड़ने का अर्थ था कि आप नए ढंग की राजनीति करनेवाले हैं।

पर अब जिसे देखो, वही आप से टूटने को आमादा है। वे कह रहे हैं कि यह वह आप नहीं रही। क्या राजनीतिक पार्टी बनते ही उसमें दूसरी पार्टियों के गुण (दोष) आ गए? या सत्तर में सड़सठ सीटों पर जीत ने उसे बावला बना दिया?
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