संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) द्वारा आयोजित ये प्रदर्शन राजनीतिक अधिकारों, विधायी प्रतिनिधित्व और आटे व बिजली की बढ़ती कीमतों जैसे स्थानीय मुद्दों से जुड़े थे, लेकिन पाकिस्तानी सेना और पुलिस ने जैसा दमन चक्र चलाया, वह इस्लामाबाद की व्यवस्थागत क्रूरता का ही जीवंत प्रमाण है। उल्लेखनीय है कि पीओके पर पाकिस्तान के कब्जे के बाद से ही वहां के लोगों को न तो पूर्ण नागरिक अधिकार दिए गए, और न ही विकास की कोई सच्ची पहल हुई। बिजली, पानी, सड़कें, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के साथ-साथ करों का भारी बोझ और संसाधनों का दोहन स्थानीय आक्रोश के प्रमुख कारण रहे हैं। इसकी तुलना में भारत द्वारा प्रशासित जम्मू-कश्मीर पिछले कुछ वर्षों में आधारभूत ढांचे, पर्यटन, निवेश, शिक्षा और स्थानीय संस्थाओं को सशक्त करने की दिशा में काफी सक्रिय रहा है।
यह स्वाभाविक ही है कि भारतीय कश्मीर से अपनी तुलना करने पर पीओके के लोगों में असंतोष और बढ़ा होगा। जो पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार कश्मीर में मानवाधिकारों की दुहाई देता रहता है, उसके अपने कब्जे वाले क्षेत्र में नागरिकों के मौलिक अधिकारों के हनन पर उसका रवैया इस्लामाबाद के दोहरे मापदंडों को ही उजागर करता है। यह देखते हुए कि पीओके की यह स्थिति कोई आज की नहीं है, इस मामले में अतीत में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया अपेक्षया कमजोर ही रही है।
हालांकि ताजा हिंसा पर चिंता जताते हुए ब्रिटेन के पचास सांसदों ने अपने विदेश मंत्री को पत्र लिखा है, लेकिन इस मामले में अन्य महाशक्तियों की चुप्पी अखरने वाली है। पीओके या दुनिया के किसी भी हिस्से में हो रही ऐसी मौतें व हिंसा की जांच न केवल वहां के लोगों के प्रति न्याय का प्रश्न है, बल्कि मानवाधिकारों की वैश्विक विश्वसनीयता से भी जुड़ा मुद्दा है। पीओके में पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ, वह वहां की दुर्दशा के बारे में भारत के दावे की ही पुष्टि करता है। ऐसे में, एक तरफ, यह भारत के लिए भी अवसर है कि वह पूरी दुनिया के समक्ष पीओके की वास्तविक स्थिति को तथ्यों व प्रमाणों के साथ अधिक सक्रियता से रखे, तो दूसरी तरफ, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी मानवाधिकारों से जुड़े इस मामले में निष्पक्ष और न्यायपूर्ण रुख अपनाना चाहिए।