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दक्षिण में महागठबंधन की परीक्षा

आर राजगोपालन Updated Sun, 25 Nov 2018 07:38 PM IST
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चंद्रबाबू नायडू और राहुल

सबरीमाला मंदिर, आंध्र प्रदेश के लिए विशेष पैकेज, राहुल गांधी का नियमित मंदिर दौरा और सीबीआई व आयकर अधिकारियों को आंध्र प्रदेश में प्रवेश करने की अनुमति न देने का मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू का फैसला-ये वे मुद्दे हैं, जिन पर दक्षिण भारत के छह राज्यों की आठ राजनीतिक पार्टियों का खासा जोर है। ये मुद्दे न केवल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की कड़ी परीक्षा लेंगे, बल्कि इसी वजह से दक्षिण भारत में महागठबंधन के अस्तित्व के लिए कठिनाई खड़ी होगी। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक में टीडीपी, द्रमुक और जेडी (एस) जैसी बड़ी पार्टियां राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन का इंतजार कर रही हैं। हां, अगर कांग्रेस राजस्थान और मध्य प्रदेश में सत्ता हासिल करती है, तो दक्षिण में महागठबंधन के तेजी से उभरने की प्रबल संभावना है।



नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राजग से निकलने के तुरंत बाद टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू ने कांग्रेस से नाता जोड़ा और अब वह दक्षिण भारत में मोदी-विरोधी मोर्चे के प्रमुख खिलाड़ी हैं। दरअसल दक्षिण की ये क्षेत्रीय पार्टियां 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रभावी भूमिका निभाना चाहती हैं, ताकि महत्वपूर्ण मंत्रालयों की मांग कर सकें। ये पार्टियां यह भी चाहती हैं कि दक्षिण में कांग्रेस को कम सीटें दी जाएं, ताकि लोकसभा चुनाव में उसकी भूमिका सीमित रहे। मसलन, द्रमुक तमिलनाडु की 40 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस को पांच से अधिक सीटें देने की इच्छुक नहीं है। अगर द्रमुक कांग्रेस को जूनियर पार्टनर मानती है, तो 2019 में कांग्रेस अपने लिए किस भूमिका की उम्मीद कर रही है? ऐसे ही टीडीपी भी आंध्र प्रदेश की 25 सीटों में से कांग्रेस को पांच सीटों से अधिक नहीं देना चाहेगी। टीडीपी 20 सीटों पर खुद लड़ना चाहती है।


ऊपर गिनाए गए मुद्दों में से कुछ बेशक राजनीतिक हैं, लेकिन कुछ मुद्दे भावनात्मक हैं। जैसे केरल में सबरीमाला का मुद्दा। यह दक्षिण भारत के हिंदुओं के लिए वैसा ही भावनात्मक मुद्दा है, जैसे उत्तर भारत में राम मंदिर का मुद्दा, जिसे भाजपा अपने लाभ के लिए भुना चुकी है। जबकि माकपा से अपनी नजदीकी के लिए कांग्रेस ने इस मुद्दे पर अपने विकल्प खुले रखे हैं। जबकि सबरीमाला मुद्दे को भुनाकर भाजपा ने केरल में अपने लिए जगह बनाई है।


दरअसल ऊपर गिनाए गए विवादास्पद मुद्दों से कांग्रेस किस तरह निपटती है, उसी के आधार पर दक्षिण में स्थिति स्पष्ट होगी। मसलन, क्या कांग्रेस सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर राजी है? क्या द्रमुक आंध्र प्रदेश के लिए विशेष दर्जे पर सहमत है? क्या राहुल गांधी आंध्र में सीबीआई को और आयकर छापे की इजाजत न देने पर राजी होंगे? अलबत्ता दक्षिण में महागठबंधन के लिए हिंदुत्व और हिंदी ज्यादा बड़े मुद्दे हैं। अगर राहुल गांधी भगवा धोती, जनेऊ और ललाट पर तिलक लगाकर मंदिर में अपने नाटकीय प्रवेश की परंपरा जारी रखते हैं, तो क्या स्टालिन चुप रहेंगे? द्रमुक नास्तिक पार्टी है, जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करती। इसलिए राहुल गांधी की मंदिर परिक्रमा उत्तर भारत के अलावा दक्षिण के कर्नाटक में भी काम कर जाएगी, लेकिन तमिलनाडु में उनकी दाल नहीं गलने वाली। द्रमुक जैसी हिंदी-विरोधी पार्टी क्या महागठबंधन जैसे हिंदी नाम वाले एक मोर्चे को दक्षिण भारत में सक्रिय होते और वर्चस्व स्थापित करते देख सकेगी?

 

दक्षिण में मोदी-विरोधी मोर्चे के प्रमुख खिलाड़ी के तौर पर उभरे चंद्रबाबू नायडू भी महागठबंधन नाम से सहमत नहीं हैं। वह इस मोर्चे को कोई दूसरा नाम देने के इच्छुक हैं। हालांकि आने वाले दिनों में खुद नायडू को भी बड़ी चुनौती का सामना करना है। अगले साल लोकसभा चुनाव के साथ आंध्र में विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं। जगन मोहन रेड्डी तो उनके प्रतिद्वंद्वी हैं ही, नायडू-विरोधी के तौर पर फिल्म स्टार पवन कल्याण भी तेजी से अपनी पहचान बना रहे हैं। जिस आंध्र में एनटी रामा राव के टीडीपी का जन्म ही कांग्रेस-विरोधी पार्टी के रूप में हुआ था, वहां के मतदाता क्या नायडू के कांग्रेस के साथ जाने को स्वीकार कर लेंगे? तमिलनाडु में द्रमुक को भी अम्मा मक्कल मुनेत्र कषगम जैसी एक नई पार्टी से चुनौती मिल रही है। यहां रजनीकांत और कमल हासन के साथ सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक भी द्रमुक को कड़ी चुनौती देंगे। तमिलनाडु की बारह पार्टियों में कांग्रेस खुद को कहां रखेगी? हालांकि तमिलनाडु में भाजपा भी कहीं नहीं है, लेकिन रजनीकांत के प्रवेश से भाजपा को मदद मिलेगी, हालांकि खुद उसे वहां एक भी सीट नहीं मिलने वाली।


जहां तक कर्नाटक की बात है, तो वहां कांग्रेस और जेडी (एस) सत्ता में हैं। लेकिन वहां संगठन के स्तर पर भाजपा मजबूत स्थिति में है। राज्य की कुल 28 सीटों में जेडी (एस) 15 सीटों पर लड़ना चाहती है, जबकि शेष 13 सीटों पर कांग्रेस लड़ेगी। लेकिन वहां की स्थिति कठिन है। छियासी साल के देवगौड़ा 2019 में प्रधानमंत्री बनने का इरादा पाले हुए हैं और लोकसभा चुनाव में भाजपा को ज्यादा सफलता मिलने की संभावना है। ऐसे ही तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव टीडीपी और चंद्रबाबू नायडू के विरोधी हैं। भाजपा इस विरोध का लाभ उठाने के लिए तैयार है। तेलंगाना में अभी विधानसभा चुनाव होने जा रहे हंै, जहां टीडीपी और कांग्रेस का गठबंधन है। अगर विधानसभा चुनाव में चंद्रशेखर राव की पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति को ज्यादा सीटें मिलती हैं, तो वह निश्चित तौर पर लोकसभा चुनाव में राजग के साथ हो जाएंगे। इसी तरह केरल में सबरीमाला मुद्दे के बाद भाजपा कांग्रेस को पीछे छोड़ दूसरे नंबर की पार्टी बन गई है, और लोकसभा चुनाव के समय एकाधिक कांग्रेस नेताओं का भाजपा के पाले में आने की संभावना है। केरल में लोकसभा की 20 सीटें हैं, और भाजपा को यहां से कम से दो सीटें मिलने की उम्मीद है।


पुडुचेरी को मिलाकर दक्षिण भारत में लोकसभा की कुल 130 सीटें हैं। इनमें से कितनी सीटें कांग्रेस को मिलेंगी और महागठबंधन की स्थिति कैसी होगी, यह तो समय ही बताएगा।  

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