मौजूदा समिट का मुख्य विषय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन-केंद्रित और मानवता को प्राथमिकता देने वाले नजरिये को दर्शाता है। हालांकि, इस विषय को व्यावहारिक नतीजों में बदलना एक चुनौती होगी, क्योंकि समूह में शामिल देशों के हित एक-दूसरे से बहुत अलग हैं। ऐसे में, ब्रिक्स के सामने पहली और सबसे बड़ी चुनौती रणनीतिक तालमेल की कमी है। जब सदस्यों के हित आपस में टकराते हैं, तो बढ़े हुए ब्रिक्स के लिए एक सुर में बात करना बहुत मुश्किल होता है।
दूसरी चुनौती ब्रिक्स के अमेरिका-विरोधी या पश्चिम-विरोधी गठबंधन बनने का खतरा है। कई सदस्य बहुध्रुवीय व्यवस्था के पक्ष में तो हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वे वाशिंगटन या यूरोप से टकराव चाहते हों। तीसरी चुनौती डॉलर पर निर्भरता कम करना है। स्थानीय मुद्राएं और भुगतान के वैकल्पिक तरीके लेनदेन की लागत और तीसरे देश की प्रणालियों पर निर्भरता को कम कर सकते हैं, पर डॉलर की जगह लेना कहीं ज्यादा मुश्किल है। चौथी चुनौती विस्तार को संभालना है। ग्यारह सदस्य और दस सहयोगी देश ब्रिक्स को प्रतिनिधित्व तो देते हैं, पर आम सहमति बनाना मुश्किल कर देते हैं।
समूह को अपनी भूमिकाएं स्पष्ट करते हुए ऐसे तरीके विकसित करने होंगे, जिनसे सहमति न होने पर भी सहयोग संभव हो सके। शी जिनपिंग की मौजूदगी मोदी को सोच-समझकर बातचीत करने का मौका दे सकती है। भारत को समिट की कूटनीति को सीमा विवाद के समाधान के रूप में समझने की गलती नहीं करनी चाहिए। हिमालयी सीमा का मुद्दा चिंता का विषय बना हुआ है। आर्थिक प्रतिस्पर्धा, दक्षिण एशिया में चीन का प्रभाव और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर मतभेद बने रहेंगे। फिर भी, सीधी बातचीत रिश्तों को स्थिर करने में मदद कर सकती है।
व्लादिमीर पुतिन और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजश्कियन की मौजूदगी समिट के भू-राजनीतिक महत्व को रेखांकित करेगी। खबरों के मुताबिक, तारिक रहमान के समिट में शामिल न होने की उम्मीद है। अगर ऐसा हुआ, तो यह साफ हो जाएगा कि शेख हसीना का मुद्दा दोनों देशों के संबंधों पर कितनी गहराई से असर डालने लगा है। इसलिए, भारत को अपनी स्वतंत्र स्थिति बनाए रखनी चाहिए, न कि किसी ताकत को बातचीत पर हावी होने देना चाहिए।
भारत का मकसद सिर्फ एक सफल घोषणापत्र तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसे वैश्विक संस्थाओं में अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए, आर्थिक मौकों व आपूर्ति शृंखला को बढ़ाना चाहिए, ऊर्जा हितों की रक्षा तथा पड़ोसियों से रिश्ते बेहतर करने और चीन व रूस के साथ बातचीत के रास्ते खुले रखने चाहिए। भारत को दिखाना होगा कि ब्रिक्स टकराव के बजाय सहयोग का मंच बन सकता है। हालांकि, यह इस पर निर्भर करेगा कि क्या इसके सदस्य साझा हितों को नुकसान पहुंचाए बिना आपसी मतभेदों को सुलझा सकते हैं या नहीं। मंच दिल्ली के पास है। असली परीक्षा यह है कि क्या भारत इसे रणनीतिक प्रभाव में बदल सकता है।