उस वक्त कई पर्यवक्षकों ने तार्किक रूप से निष्कर्ष निकाला था कि बालाकोट संकट-जो 14 फरवरी, 2019 को पुलवामा में भारतीय केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के काफिले पर जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) के आत्मघाती बम विस्फोट से शुरू हुआ था, जिसने भारतीय सैन्य जवाबी कार्रवाई और उसके बाद 26-27 फरवरी को भारत-पाकिस्तान हवाई संघर्ष को उकसाया था-बिल्कुल इसी दिशा में बढ़ रहा था। यह अंततः एक पूर्ण पैमाने पर युद्ध के रूप में परिणत नहीं हुआ, जैसी की आशंकाएं जताई जा रही थीं, इसके लिए काफी हद तक अनुकूल राजनीतिक परिस्थितियों को श्रेय जाता है। उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने बड़ी ही कुशलता से इस घटना को कम करके आंका था, लेकिन अगर दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता के लिए इस तरह के घातक परिणामों को स्थायी रूप से टालना है, तो इस उथल-पुथल के मूल कारण अर्थात पाकिस्तानी सेना द्वारा अपने पड़ोसियों के खिलाफ आतंकवादी समूहों को लगातार समर्थन दिए जाने का अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अंततः पाकिस्तानी राजनेताओं द्वारा सीधे तौर पर विरोध किया जाना चाहिए। लेकिन हकीकत में ऐसा हुआ नहीं। यह देखा गया कि 10 मई, 2025 को सरगोधा और रावलपिंडी पर भारत ने हमला किया, उसके बाद पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने अमेरिका के विदेश मंत्री से तनाव को कम करने की गुहार लगाई। ठीक उसी समय पाकिस्तान के सशस्त्र बलों को बहावलपुर के मरकज सुभान अल्लाह में मारे गए आतंकवादियों का अंतिम संस्कार करते देखा गया, जो जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण और भर्ती केंद्र संचालन का मुख्यालय था। इनमें से कुछ आतंकवादियों को संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित सूची में रखा गया था।
इस पृष्ठभूमि में हमें यह जानकार भी आश्चर्य हुआ कि मुनीर को फील्ड मार्शल के पद पर पदोन्नत कर दिया गया। वास्तव में ऐसा इसलिए नहीं था कि वह अपने देश के लिए उत्पन्न खतरे से निपट सकते थे, बल्कि इसलिए कि उन्होंने ट्रंप कॉरपोरेशन के लिए एक व्यापारिक सौदे में भूमिका निभाई थी। इसके साथ ही, हमें पता चला कि ट्रंप प्रशासन ने न्यूयॉर्क की एक अदालत को बताया था कि भारत और पाकिस्तान केवल तभी ‘अस्थिर संघर्ष विराम’ पर पहुंचे थे, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘हस्तक्षेप किया और दोनों देशों को पूर्ण पैमाने पर युद्ध को टालने के लिए अमेरिका के साथ व्यापारिक पहुंच की पेशकश की।’
वहीं, भारत के सरकारी सूत्रों का कहना है कि दोनों देशों के बीच किसी तीसरे पक्ष की भागीदारी के बिना समझौता हुआ है। और न ही कोई व्यापार समझौता हुआ और न ही संघर्ष विराम को बढ़ावा दिया गया। आतंकवाद से निपटने को एक व्यापारिक सौदे के रूप में नहीं देखा जा सकता। हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 25 फरवरी, 2025 को पाकिस्तान के एफ-16 बेड़े के रखरखाव के लिए 39.7 करोड़ डॉलर आवंटित किए हैं, जबकि अमेरिकी कांग्रेस ने मोदी सरकार की कूटनीतिक रणनीति पर सवाल उठाया है और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए भारत की विदेश नीति प्राथमिकताओं के पुनर्मूल्यांकन का आह्वान किया है। अमेरिकी कार्रवाई बेतुकी और सिमिंगटन अमेंडमेंट का स्पष्ट उल्लंघन थी। सिमिंगटन अमेंडमेंट अमेरिकी संसद द्वारा पारित एक कानून है, जो अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के सुरक्षा उपायों के बाहर परमाणु संवर्धन उपकरण और प्रौद्योगिकी प्राप्त करने, उत्पादन करने या उपयोग करने वाले देशों को अधिकांश आर्थिक और सैन्य सहायता पर प्रतिबंध लगाता है। इसे 1976 में सीनेटर स्टुअर्ट सिमिंगटन द्वारा पेश किया गया था। इस तरह भारत को आतंकवाद को लेकर अमेरिकी नीति की अस्पष्टता और जटिलता से उबरना होगा, भले ही अमेरिका को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 9/11 के आतंकवादी हमलों के भयावह अनुभव हों और यह भी पता हो कि इन हमलों का मुख्य सरगना ओसामा बिन लादेन एबटाबाद में पाकिस्तानी सैन्य अकादमी के बगल में स्थित एक घर में आराम से बैठा हुआ था। वहां पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा था।
इतिहास का गहन अध्ययन करने पर पता चलता है कि अमेरिका अपने नापाक उद्देश्यों के लिए पाकिस्तान को नियमित रूप से और जानबूझकर अग्रिम पंक्ति के राष्ट्र के रूप में इस्तेमाल करता रहा है और पाकिस्तान अमेरिका और मुजाहिदीन के बीच मध्यस्थ की अपनी भूमिका के लिए गंभीर कीमत चुका रहा है। उनके रक्षा मंत्री ने खुद एक खोखले बयान में सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि पाकिस्तान ने पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में स्थानीय और विदेशी भाड़े के आतंकवादियों को इकट्ठा किया है, जिन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है।
दूसरी ओर, उनकी इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) अपने नापाक इरादों के लिए इन हत्यारे तंत्रों का प्रभावी और उद्देश्यपूर्ण तरीके से इस्तेमाल करती है और यह अच्छे से स्थापित है। इसलिए अमेरिका के नीति निर्माताओं को इस पर ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा, यह भी विडंबना है कि पाकिस्तान वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (एफएटीएफ) की जांच से बच निकला है। यह वैश्विक मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादी वित्तपोषण निगरानी संस्था है। यह अंतरराष्ट्रीय मानक निर्धारित करती है, जिसका उद्देश्य इन अवैध गतिविधियों और समाज को होने वाले नुकसान को रोकना है। एफएटीएफ ने आश्चर्यजनक रूप से पाकिस्तान पर लागू ग्रे एरिया लेबल को हटा दिया और सभी नियंत्रण हटा दिए। कुल मिलाकर, जब तक वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान को उसकी कारगुजारियों के लिए समर्थन मिलना बंद नहीं होता है, तब तक वहां आतंकवाद पनपता और फलता-फूलता रहेगा।