वामपंथी राजनीतिक भाषा में आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध की दिशा से किसी को विचलित करने के लिए भाषाई विराम अब भी पर्याप्त नहीं है। ममदानी, जो न्यूयॉर्क के मेयर चुनाव में अग्रणी उम्मीदवार से बढ़कर हैं, ने तथाकथित शहरी विशिष्टों (स्नोफ्लेक्स) को क्रांति बेचकर प्रगतिशील कट्टरपंथ के युवराज का खिताब पहले ही जीत लिया है। ममदानी के इस तीखे हमले के कारण वैचारिक विद्रोह के डर से दक्षिणपंथी लामबंद हो सकते हैं, और यह रिपब्लिकन के लिए उतना बुरा नहीं है, जो न्यूयॉर्क में लगातार हारते रहे हैं।
क्या राष्ट्र का विचार या उस पर आधारित राजनीति, नए कट्टरपंथियों की साझा पीड़ित होने की भावना को और बढ़ाती है? क्या ऐसा है कि प्रगतिशील कहानी में राष्ट्रीय महानता की पुनर्स्थापना पर दक्षिणपंथी परियोजना, एक बनावटी अतीत से अपना कच्चा माल प्राप्त करती है, तथा वह जिस भविष्य का वादा करती है, वह एक कल्पना है, जिसका उद्देश्य दुखी लोगों को नशे में डालना है?
पीड़ित होने का दिखावा करने वाले एक ईसाई वामपंथ के लिए पीड़ित को सहानुभूति के चौराहे पर लाने की खातिर वर्जनाएं जरूरी शर्त हैं। आतंकवाद के खिलाफ युद्ध मानवता के खिलाफ युद्ध है, भोजन की कतारों में खड़े गाजा के बच्चे इसकी गवाही देंगे। और सात अक्तूबर, 2023 को दक्षिणी इस्राइल में जो कुछ भी हुआ, उसके लिए राष्ट्रीय प्रतिक्रिया की नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है। यह एक अन्यायपूर्ण इतिहास की शुरुआत की यात्रा है और इस तरह से नैतिकता का उलटा प्रभाव सड़क पर लड़ने वाले लोगों और उनके वैचारिक सहयोगियों द्वारा हासिल किया जाता है।
इस्राइल वह राष्ट्र है, जो नारों की लड़ाई के बीच सबसे अधिक अलगाव महसूस करता है और अपने जीने के अधिकार के लिए अविचल रूप से कार्य करता है। जब इस्राइल के खिलाफ आतंक का अभियान ममदानी जैसे प्रशिक्षु क्रांतिकारियों को इंतिफादा का वैश्वीकरण करने जैसा यहूदी विरोधी नारा देने के लिए प्रेरित करता है, तो यह दर्शाता है कि किस तरह से तुच्छ बयानबाजी राष्ट्रों के अस्तित्व के संघर्ष को मानवता के विरुद्ध आतंक में बदल सकती है। जो लोग इस्राइल को अस्तित्व का अधिकार देने से इन्कार करते हैं, उनके खिलाफ इस्राइल का स्थायी बचाव, अंतरराष्ट्रीय नैतिकता के लोकप्रिय संस्करण की अस्वीकृति है। किसी भी अन्य राष्ट्र ने, चाहे उसे जिहादियों और आतंकवाद के समर्थकों द्वारा आतंकवादी राज्य के रूप में चित्रित किया गया हो, युद्ध के मैदान में राष्ट्र के विचार को एकमात्र कारण नहीं बनाया है। बचाव की तीव्रता और इसके कार्यक्षेत्र के लगातार बढ़ते विस्तार ने निश्चित रूप से गाजा में गंभीर मानवीय संकट पैदा कर दिया है। आतंकवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय संघर्ष के बारे में इस्राइल जो कहानी कहता है, वह यहूदी-विरोधी अभियान की कथात्मक चौड़ाई और फलस्तीनी संघर्ष के अमर रोमांस से कहीं अधिक बड़ी है। इस्राइल की दृढ़ता ने इंतिफादा को आसानी से सीमा पार करने की अनुमति नहीं दी है।
आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध में तर्क भी मददगार साबित हो सकते हैं। भारत आतंकवादी हमले के शिकार राष्ट्रों के लिए पीड़ित राष्ट्र की विश्वसनीयता के साथ तर्क प्रस्तुत कर रहा है। आतंक के साथ जीने की हमारी कहानी स्वतंत्र भारत जितनी पुरानी हो सकती है, लेकिन 2014 के बाद से, जब मोदी राष्ट्रीय मुक्ति के नारे के साथ सत्ता में आए, तो संदेश की तात्कालिकता के साथ-साथ त्वरित जवाब का सिद्धांत भी सामने आया है। इस संदेश को कभी भी पूर्ण स्वीकृति नहीं मिली, इसका एक कारण यह भी है कि दुनिया के कुछ हिस्सों में कश्मीर के बारे में गलत धारणा व्याप्त है, तथा भारत-पाकिस्तान तनाव को ऐतिहासिक अपरिहार्यता के रूप में देखा जाता है।
वामपंथियों द्वारा इस्लामोफोबिया की दीवार भी खड़ी की गई है, जो इस्लाम और वैश्विक आतंकवाद पर एक ईमानदार बहस को बर्दाश्त नहीं कर सकते। पहलगाम में जो हुआ, उसकी शैली और बर्बरता, दो साल पहले इस्राइल में हुए हमास के हमले की तरह ही मजहब से प्रेरित थी। इस संकट की घड़ी में दुनिया भारत के साथ खड़ी थी। दुनिया ने भारत के सटीक जवाबी कार्रवाई करने के राष्ट्रीय संकल्प और सजा मिलने के बाद उसके संयम का समर्थन करने में उतनी तत्परता नहीं दिखाई। भारत को अपनी कहानी को आगे बढ़ाना था और इस बात पर जोर देना था कि विश्व को इसे अपना मानना चाहिए।
यही वह संदेश है, जो मोदी दुनिया को देना चाहते हैं, और यह संदेश एक ऐसे नेता की ओर से है, जो जानता है कि इस्लामवादी वैधता के साथ आतंकवाद के विरुद्ध बहस जीतने के लिए क्या करना होगा। चूंकि आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध एक बार फिर एकजुट वैश्विक प्रतिक्रिया के बजाय पृथक राष्ट्रीय कार्रवाई बन गया है, इसलिए इस संदेश को विश्वसनीय और तात्कालिक बनाने के लिए एक ऐसे नेता की आवश्यकता है, जिसके पास उतना ही ठोस और स्थायी लोकतांत्रिक जनादेश हो, जितना कि आज दुनिया में अकेले मोदी के पास है।
इंतिफादा (विद्रोह) का वैश्वीकरण एक भयावह कल्पना है, लेकिन जाने या अनजाने में, भारत के प्रधानमंत्री अपने पास उपलब्ध हर अंतरराष्ट्रीय मंच से यह कहकर एक प्रतिवाद प्रस्तुत करते हैं कि दुनिया को आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की जरूरत है।