छह दशक लंबे संघर्ष के बाद केंद्र ने तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की घोषणा कर दी। तेलंगाना को पृथक राज्य तो बनना ही था, पर जिस तरह से अभी जल्दबाजी दिखाई गई, वह सही नहीं है। पिछले नौ वर्षों से चुप्पी साधे यूपीए की सरकार ने अब बिना किसी आधारभूत तैयारी के अचानक पृथक तेलंगाना राज्य की घोषणा कर दी।
अगर उसे तेलंगाना को अलग राज्य बनाना ही था, तो पहले आंध्र एवं रायलसीमा के लोगों को भरोसे में लेना चाहिए था। वहां के लोगों ने हैदराबाद में काफी निवेश किया है। अब उनमें दहशत का माहौल है और वे करोड़ों की संपत्ति लाखों में बेचकर जा रहे हैं।
संस्कृति के मामले में तेलंगाना का क्षेत्र बाकी आंध्र से बेशक अलग है, पर आंध्र, रायलसीमा और तेलंगाना, तीनों क्षेत्रों की भाषा एक ही है। जाहिर है, यह बंटवारा भाषा के आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक कारणों से हुआ है। इस फैसले के पीछे दो तात्कालिक कारण हैं। असल में इसके पीछे राहुल गांधी की भूमिका महत्वपूर्ण है। जगन मोहन रेड्डी के बढ़ते प्रभाव को नुकसान पहुंचाने के लिए ऐसा किया गया है।
इसके अलावा, तेलंगाना के क्षेत्र में हाल के दिनों में भाजपा का प्रभाव भी बढ़ा है। अगले कुछ दिनों में वहां नरेंद्र मोदी का कार्यक्रम होने वाला है। लोकसभा चुनाव को सामने रखकर तेलंगाना क्षेत्र में भाजपा को निष्प्रभावी करने के लिए भी कांग्रेस ने यह जल्दबाजी दिखाई है। ऐसी भी बातें सुनने में आ रही हैं कि कांग्रेस ने के चंद्रशेखर राव से समझौता किया है, जिसके तहत टीआरएस लोकसभा चुनाव में तेलंगाना की ज्यादा सीटें कांग्रेस को देंगी और बदले में कांग्रेस विधानसभा चुनाव में उन्हें ज्यादा सीटें देंगी।
कांग्रेस के इस फैसले से आंध्र की राजनीति में गरमाहट आ गई है। भले ही कांग्रेस ने आंध्र के इलाके में प्रभावी चिरंजीवी की प्रजाराज्यम पार्टी को पहले ही अपने में मिला लिया है, लेकिन उसकी चुनौतियां कम होने वाली नहीं हैं। आंध्र प्रदेश के छह मंत्रियों ने इस फैसले के खिलाफ अपने इस्तीफे सौंप दिए हैं। मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी ने भी इस्तीफा देने की धमकी दी है। आंध्र के इलाके से कांग्रेस के 18 सांसद आते हैं। इस फैसले के बाद यूपीए सरकार के लिए संसद में खाद्य सुरक्षा विधेयक को पारित कराने में भी मुश्किल आएगी।
भाजपा भले ही तेलंगाना राज्य का समर्थन कर रही है, लेकिन संसद में जब इससे संबंधित विधेयक आएगा, तो वह कांग्रेस का साथ नहीं देगी। जो स्थिति बन रही है, उसमें वहां लोकसभा चुनाव के साथ-साथ कहीं विधानसभा चुनाव कराने की भी नौबत न आ जाए। अभी तो इस्तीफों का दौर शुरू ही हुआ है, आगे देखिए कि क्या-क्या होता है।
राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से भी इस फैसले का संदेश जाएगा और कई नए राज्यों के निर्माण की मांग जोर पकड़ेगी। ऐसे फैसले से क्षेत्रीय क्षत्रपों का राजनीति में उभार होता है, जो केवल क्षेत्रीय अस्मिताओं की बातें करते हैं, व्यापक राष्ट्रीय हित की बात नहीं सोचते। इसलिए दीर्घकालीन अर्थों में छोटे राज्यों के निर्माण को बहुत उचित नहीं कहा जा सकता।
नए राज्य के फैसले को व्यावहारिक रूप में देने में अभी पांच- छह महीने का वक्त लगेगा। चंडीगढ़ की तरह हैदराबाद को संयुक्त राजधानी बनाने का फैसला कारगर होने वाला नहीं है। इसके अलावा राज्य के प्राकृतिक एवं आर्थिक संसाधनों के बंटवारे में भी कई मुश्किलें सामने आएंगी। इसके लिए सरकार कैबिनेट कमेटी बनाएगी और उसके सुझाए फॉर्मूले पर संसाधनों का बंटवारा किया जाएगा, लेकिन यह इतना आसान नहीं है। तेलंगाना क्षेत्र में करीब साठ फीसदी नक्सली हैं। आंध्र प्रदेश में जब नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाया गया था, तो सारे नक्सली भागकर पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में चले आए थे। अब वहां नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है, तो एक बार फिर इस इलाके में उनकी गतिविधियां बढ़ेंगी। यह इलाका फिर से नक्सलियों की पनाहगाह बन सकता है।