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नौकरियां बदलने की तकनीक

फ्रांसिस कुरियाकोस व दीपा अय्यर Updated Thu, 15 Nov 2018 06:58 PM IST
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कृत्रिम बुद्धिमत्ता

हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-एआई) के युग में जी रहे हैं, जो हमें अत्यधिक प्रसंस्करण शक्ति, भंडारण क्षमता, और जानकारी तक पहुंच प्रदान करता है। प्रौद्योगिकी के विकास ने सबसे पहले हमें कताई का चरखा, फिर बिजली और तीसरे औद्योगिक क्रांति में कंप्यूटर दिया। वर्ष 2016 में वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम ने एआई को 'चौथी औद्योगिक क्रांति' बताया, जिसने हमारे जीने, काम करने और एक दूसरे के साथ संपर्क करने के तरीके को मूल रूप से बदल दिया। हालांकि इसने हमें डाटा स्वामित्व और श्रम संरक्षण जैसी नियामक चुनौतियां भी दी हैं।



खास तौर से स्वचालन (ऑटोमेशन) रोजगार और मजदूरी के स्तर को प्रभावित करता है। प्रौद्योगिकी और रोजगार पर ऑक्सफोर्ड मार्टिन कार्यक्रम के 2013 का एक अध्ययन बताता है कि 2000 से मात्र 0.5 फीसदी नए रोजगार का ही सृजन हुआ है, जो पहले नहीं था। यह जी-7 देशों के 17.3 करोड़ रोजगार के विपरीत है, जो अगले आठ साल में स्वचालन का शिकार हो जाएगा। दुनिया भर में 702 पेशेवरों की जांच के बाद ऑक्सफोर्ड के प्रोफेसर कार्ल फ्रे और माइकल ओसबोर्न का अध्ययन बताता है कि मंझोले कौशल से संबंधित नौकरियां अगले कुछ वर्षों में स्वचालित हो जाएंगी। नतीजतन, वे तर्क देते हैं कि भारत, जिसमें 65 प्रतिशत वैश्विक आईटी विदेशी काम है और 40 प्रतिशत वैश्विक व्यापार प्रसंस्करण का काम है, के पास 2030 तक औपचारिक रोजगार में 69 फीसदी नौकरियां स्वचालित हो जाएंगी। इस संदर्भ में हम वृहत (मैक्रो) और सूक्ष्म (माइक्रो) स्तर पर भारत में ऑटोमेशन के प्रभाव और उभरती श्रम नीतियों के सवालों की जांच करते हैं।


अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार, भारत में औपचारिक रोजगार का 60 फीसदी क्लैरिकल, सेल्स, सर्विस, कुशल कृषि व्यापार से संबंधित कार्य है, और इन सभी को स्वचालन का खतरा है। इसलिए वृहत स्तर पर स्वचालन का पूरी अर्थव्यवस्था पर और सूक्ष्म स्तर पर श्रमिकों के लिए कार्यस्थल स्तर पर प्रभाव पड़ सकता है। स्वचालन से तीन प्रमुख परिवर्तन होंगे-कौशल मांग में बदलाव, कार्यबल की पुनर्तैनाती में लैंगिक असमानता और कंपनियों का पुनर्गठन।


नतीजतन कुछ नौकरियों में काम आैर जीवन में संतुलन बेहतर होगा, जबकि कुछ नौकरियां पूरी तरह खत्म हो जाएंगी। मसलन, कॉल सेंटर, रिटेल और प्रशासन से जुड़ी नौकरियां सिमट जाएंगी, जिनमें अभी मुख्य रूप से महिलाएं काम करती हैं। जबकि डाटा क्लीन-अप और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण मुख्य रूप से पुरुषों द्वारा किया जाता है, जिनकी काफी मांग होगी। इससे परिवर्तन का एक लैंगिक पहलू सामने आ रहा है। अंततः स्वचालन और श्रमिकों की पुनर्तैनाती कंपनियों के साझा प्लेटफॉर्म के जरिये होगी, जहां किसी भी स्थान से श्रमिकों की भर्ती की जा सकेगी। यह अल्पावधि में कंपनी और कार्यबल की रणनीति के बीच मतभेद का कारण बनेगा।


माइक्रो स्तर पर ऑटोमेशन कार्य का मतलब बदल देगा। नौकरियों को तेजी से अनियमित कार्यों के सेट के रूप में वर्णित किया जाएगा। स्वतंत्र श्रमिक विशिष्ट मजदूरी दरों के लिए कार्यों का पोर्टफोलियो प्रदर्शन करेंगे। कार्यस्थल पर निरीक्षण के पदानुक्रम को दूरस्थ टीमों के सहयोग और वितरण के जरिये बदल दिया जाएगा। इससे कामगारों में काम करने की इच्छा घटेगी और आपसी संवाद भी कम होगा। नतीजतन न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक लाभ, सामूहिक सौदेबाजी जैसी नियोक्ता जिम्मेदारियों में भारी कमी आएगी।

 

श्रम नीति में तीन प्रमुख क्षेत्र हैं, जिन पर आनेवाले वर्षों में ध्यान देने की जरूरत है-श्रमिकों को कौशलयुक्त बनाना, अल्पावधि में सामाजिक नीति पर पुनर्विचार और लंबी अवधि में केयर इकोनॉमी जैसे नए क्षेत्रों की रोजगार संभावना की पुन: जांच करना। स्वचालन में मौजूदा श्रमिकों को फिर से प्रशिक्षित करना, दूसरों को नए कार्यों में पुन: नियोजित करना और विश्वविद्यालय में पढ़ रहे छात्रों को संभावित श्रमिकों के रूप में नए कौशल से लैस करना शामिल है।


एशिया प्रशांत क्षेत्र के लिए 2017 आईडीसी कॉग्निटिव यूजर एडोप्शन सर्वे बताता है कि 70 प्रतिशत भारतीय कंपनियां एआई का लाभ उठाने के लिए कर्मचारियों के प्रशिक्षण में अतिरिक्त निवेश करने की योजना बना रही हैं। इसके अलावा, 'स्मार्ट' काम और विशिष्ट कौशल की मांग विश्वविद्यालयों को उच्च शिक्षा और प्रशिक्षण को फिर से तैयार करने तथ राज्यों को नौकरी के बाजार में संक्रमण की सुविधा के लिए प्रोत्साहित करेगी।
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दूसरा, कामकाजी लोगों की आबादी, सेवानिवृत्ति, और व्यक्तिगत जीवन योजनाओं पर पुनर्विचार करने की तत्काल आवश्यकता है। तीसरा, विनिर्माण और उद्योगों के बाहर नए क्षेत्रों को देखने की तत्काल आवश्यकता है, जिनके पास स्वचालन के युग में भुगतान वाला रोजगार पैदा करने की क्षमता है। नई राष्ट्रीय औद्योगिक नीति (2018) पेश करते हुए केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री सुरेश प्रभु ने इसे रेखांकित किया था। केयर इकोनॉमी एक ऐसा महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसमें रोजगार पैदा करने की अपार क्षमता है, इसकी पुष्टि आईएलओ की रिपोर्ट में भी की गई है। इस रिपोर्ट का अनुमान है कि हर दिन दो घंटे अवैतनिक देखभाल संबंधी कार्य करने वाले लोग दो अरब लोगों के आठ घंटे के बराबर श्रम करते हैं। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक उद्यमों में बढ़े निवेश के साथ, इस क्षेत्र में 2030 तक 26.9 करोड़ नौकरियां पैदा की जाएंगी। इससे खास तौर पर महिलाओं को फायदा होगा, जो वैश्विक स्तर पर वर्तमान अवैतनिक देखभाल कार्य का दो-तिहाई काम करती हैं।

 

भारतीय नीति निर्माताओं के सामने कृत्रिम बुद्धिमत्ता दार्शनिक, प्रौद्योगिकीय और नैतिक चुनौतियां पेश करती है। हालांकि, तकनीकी परिवर्तन के इस क्षण में, मानव निर्णय अल्पकालिक कठिनाइयों पर दीर्घकालिक चिंताओं को प्राथमिकता देने की मांग करता है। यह हमें पारंपरिक, रैखिक और गैर-विघटनकारी सोच से दूर रहने का संदेश देता है।


फ्रांसिस कुरियाकोस कैंब्रिज विश्वविद्यालय के कैंब्रिज डेवलपमेंट इनीशिएटिव के सलाहकार और दीपा अय्यर वहां की रिसर्च डायरेक्टर हैं।

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