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दिलों को जोड़ने वाली राजनीति: तमिलनाडु की हिंदी बोलने वाली युवा मंत्री, बदलती सोच का प्रतीक

उमेश चतुर्वेदी
Updated Tue, 19 May 2026 06:01 AM IST

सार

तमिलनाडु की नई सरकार की सबसे युवा मंत्री का यह कहना कि मैं हिंदी बोलती हूं, ताकि मेरे नेता व पार्टी को पूरा देश जाने, तमिल राजनीति की बदलती सोच का ही प्रतीक है।
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विजय सरकार की मंत्री एस कीर्तना - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

तमिलनाडु की नवेली सत्ता की युवा मंत्री एस कीर्तना को राजाजी की ही कड़ी में रखा जा सकता। राजाजी के बाद तमिल राजनीति का वह दूसरा चेहरा हैं, जो न सिर्फ फर्राटेदार हिंदी बोलती हैं, बल्कि हिंदी के जरिये देश से जुड़ने और उसे बोलने के समर्थन में तर्क भी देती हैं। विजय मंत्रिमंडल की सबसे युवा मंत्री बनने के बाद एस कीर्तना ट्रोलर्स के निशाने पर रहीं। तमिल राजनीति के लिए हैरत और गुस्से की वजह उनका हिंदी बोलना बन गया। चुनाव प्रचार के दौरान भी उन्होंने हिंदी में बात की थी। तमिल राजनीति का परंपरावादी धड़ा कैसे बर्दाश्त करता कि उनकी मंत्री हिंदी बोलें। पर उसका भी उन्होंने बखूबी जवाब दिया। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ‘मैं चाहती हूं कि मेरी पार्टी का प्रतिनिधित्व पूरे भारत और दूसरे देशों तक पहुंचे। इसलिए, मैं हिंदी में बोल रही हूं। हर किसी को मेरे नेता व मेरी पार्टी के बारे में जानकारी होनी चाहिए।’


1938 में ही तमिलनाडु की राजनीति के लिए भाषा का मुद्दा संवेदनशील बन गया था, जब मद्रास प्रांत की सरकार के मुखिया के नाते राजाजी ने प्राथमिक शिक्षा में हिंदी पढ़ाने की शुरुआत की। तब द्रमुक के संस्थापक सी ए अन्नादुरै ने हिंदी विरोध में मोर्चा खोल दिया, जिसकी वजह से राजाजी को पीछे भी हटना पड़ा था। द्रमुक का गठन भले ही 1949 में हुआ, पर जिन मुद्दों को लेकर 1944 में उसकी पूर्ववर्ती जस्टिस पार्टी की स्थापना हुई, उसमें एक मुद्दा तमिल अस्मिता से भी जुड़ा था। तमिल अस्मिता की जब भी बात होती है, वह घूमकर हिंदी विरोध पर चली जाती है। एक तरह से कहें, तो द्रविड़ दलों के राजनीतिक उभार के पीछे का एक मुद्दा यह भी रहा है।


सांविधानिक प्रावधानों के तहत जब 26 जनवरी, 1965 को हिंदी को पूरे देश की राजभाषा के रूप में स्थापित होना था, तमिलनाडु में तीखा विरोध शुरू हुआ। तब से तमिल राजनीति में हिंदी विरोध की घोषित परंपरा जारी है। राजनीति की एक रवायत है, वह लीक पर चलने में ज्यादा विश्वास करती है। ऐसे में, कीर्तना का हिंदी बोलना लीक को तोड़ना ही है। वह जानती हैं कि हिंदी के बिना अपनी बात दूर-दूर तक नहीं पहुंचाई जा सकती। तमिलनाडु से उभरकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे कई राजनेताओं का भी मानना है कि अखिल भारतीय राजनीतिक छवि व पहुंच के लिए हिंदी की जानकारी जरूरी है। पंडित नेहरू के निधन के बाद नए प्रधानमंत्री बनने के सवाल के जवाब में तमिलनाडु के ही के कामराज का भी नाम उभरा था। पर उन्होंने हिंदी न बोल पाने की वजह से अपना नाम वापस ले लिया था। कीर्तना हिंदी को ‘राष्ट्रीय जुड़ाव’ का माध्यम मानती हैं। पिछले साल जोहो के संस्थापक श्रीधर बेंबू ने भी तमिल युवाओं से हिंदी सीखने की वकालत करते हुए कुछ ऐसी ही बात कही थी। तब उनके खिलाफ तमिल राजनीति उठ खड़ी हुई थी। पर वह खालिस राजनेता नहीं, बल्कि तमिलनाडु से उभर कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबारी साख हासिल करने वाली शख्सियत हैं। इसलिए, उनके सुझाव का विरोध लंबे समय तक नहीं चल पाया। कीर्तना अगर हिंदी बोलने की हिम्मत दिखा रही हैं, तो इसका संदेश हिंदी के प्रति सरेंडर का नहीं, बल्कि संचार के साधन के रूप में उसका प्रभावी इस्तेमाल है। कीर्तना की यह सोच तमिलनाडु की उसी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है, जो हिंदी के जरिये गैर तमिल क्षेत्रों के लोगों से अपनी बात कहना और अपने विचारों को साझा करना चाहती है।


अब तक भाषा का मुद्दा तमिल अस्मिता और गौरव से जुड़ा रहा है। इसी कारण, राष्ट्रीय मुद्दों पर तमिल राजनीति की सोच से देश वंचित रह जाता है। चूंकि, कीर्तना परिचित व परीक्षित राजनीतिक लीक से अलग हैं, इसलिए विरोध स्वाभाविक है। पर यह तमिल राजनीति की नई पीढ़ी की बदलती सोच का भी प्रतीक है। भाषा के मुद्दे पर बदलाव रातोंरात नहीं आता, वह धीरे-धीरे ही आता है। कीर्तना की सोच इसी धीमे बदलाव का जरिया है। भाषाओं के जरिये देश के दिलों को जोड़ने वालों को इसका स्वागत करना ही चाहिए।
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