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भाषा को राजनीतिक पूंजी न बनाएं: त्रिभाषा फॉर्मूले पर सहमति के बाद कैसा विरोध! क्या चुनावी दिनों की गोलबंदी...?

बद्री नारायण
Updated Thu, 20 Mar 2025 05:27 AM IST

सार

शिक्षा मंत्री द्वारा हाल ही में जारी तमिलनाडु सरकार के एक पत्र से जाहिर होता है कि पहले यही तमिलनाडु सरकार एनईपी-2020 और उसके इस भाषाई समाहार की रणनीति से सहमत थी, किंतु राजनीति है और चुनाव के दिन आने वाले हैं, तो गोलबंदी के कुछ भावनात्मक मुद्दे तो चाहिए।
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एमके स्टालिन, सीएम, तमिलनाडु - फोटो : ANI


इधर, कुछ दिनों से कुछ राज्य सरकारें विशेषतया डीएमके के नेतृत्व वाली तमिलनाडु की सरकार ने इस त्रिभाषा फॉर्मूले का विरोध करना शुरू किया है। हालांकि, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा हाल ही में जारी तमिलनाडु सरकार के एक पत्र से जाहिर होता है कि पहले यही तमिलनाडु सरकार एनईपी-2020 और उसके इस भाषाई समाहार की रणनीति से सहमत थी, किंतु राजनीति है और चुनाव के दिन आने वाले हैं, तो गोलबंदी के कुछ भावनात्मक मुद्दे तो चाहिए। ऐसे में डीएमके के रणनीतिकारों ने तमिल-हिंदी द्वंद्व खड़ा कर एनईपी-2020 के  त्रिभाषा की आत्मा को ही क्षत-विक्षत कर दिया।


अगर गहराई से देखें, तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के ज्ञान विमर्श को नए रूप में आविष्कृत करती है। यह महात्मा गांधी की वर्धा शिक्षा योजना से भी प्रेरणा लेती है। यह प्रधानमंत्री मोदी के विकसित भारत के लिए नॉलेज कॉस्मॉस बनाने वाली शिक्षा नीति है। यह भारत की बहुलता एवं बहुभाषिकता की मूल प्रेरणा को विकसित करती है। ऐसे में ऐसा कोई भी द्वंद्व, जो किसी सीमित राजनीतिक मन से खड़ा किया जाए, वह राष्ट्रीय आंदोलन एवं राष्ट्र निर्माण की आत्मा को आघात पहुंचाता है। यों भी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, गांधीवादी विमर्श और प्रधानमंत्री मोदी की कार्य योजना में तमिल भाषा एवं संस्कृति सदा महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने विश्व के बड़े मंचों पर और भारत में अपने अनेक संवादों में तमिल भाषा की पुरातनता और उसकी समृद्ध परंपरा की चर्चा की है। 


तमिल-उत्तर भारत संवाद के लिए काशी और सौराष्ट्र में तमिल संगमम आयोजित करते रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी की प्रेरणा से पिछले तीन वर्षों से शिक्षा मंत्रालय काशी-तमिल संगमम काशी में आयोजित कर रहा है। ऐसे में कुछ राजनीतिक शक्तियों को किसी बनाम और टकराहट की राजनीति की क्या जरूरत हो रही है? इसका मूल कारण है कि कुछ राजनीतिक शक्तियां भाषा को एक राजनीतिक और चुनावी पूंजी में बदल देना चाहती हैं। इसके लिए उन्हें हिंदी के विरुद्ध की राजनीति खड़ी करने की जरूरत पड़ती रहती है।


संसद में इस विषय पर चल रही बहसों के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने तमिलनाडु सरकार के उस पत्र को जारी किया है, जिसमें साल भर पहले नई शिक्षा नीति के तहत राज्य में पीएम श्री योजना लागू करने की उत्सुकता दिखाई गई थी। इस विमर्श में शिक्षा मंत्री ने कुछ महत्वपूर्ण तथ्य साझा किए हैं। एक तो उन्होंने बताया है कि नई शिक्षा नीति में हिंदी को थोपने जैसा कुछ भी नहीं है, वह तो हर राज्य में पांचवीं कक्षा तक मातृभाषा में शिक्षा देने की पक्षधर है। दूसरा, उन्होंने तमिलनाडु सरकार और डीएमके के नेता एमके स्टालिन से आत्मनिरीक्षण करने की अपील करते हुए कहा है कि वे विचार करें कि लगातार राज्य में तमिल माध्यम में शिक्षा लेने वालों की संख्या घट रही है। उन्होंने आग्रह किया कि डीएमके यह समझे कि दुनिया में पिछले दशकों में अनेक बदलाव आए हैं। नई पीढ़ी को नई जरूरतों के आधार पर हमें शिक्षा देनी ही होगी। रोजगार की दुनिया में जब हमारे छात्र उतरते हैं, तो बहुभाषिकता ही उनकी शक्ति बनती है।


सचमुच भारतीय समाज पिछले दशकों में एक आकांक्षापरक समाज में बदला है। हमारे छात्र-छात्राओं और युवाओं में गतिशीलता बढ़ी है। वे जाति और क्षेत्र के दायरे से निकलकर पूरा आसमान छूना चाहते हैं। ऐसे में उन्हें छह-सात दशक पहले की भाषाई राजनीति में फंसाना कहां तक ठीक है? यह देखना रोचक है कि जो कांग्रेस साठ-सत्तर के दशक में त्रिभाषा फॉर्मूले के पक्ष में रही थी, आज उससे दूरी क्यों बना रही है? राष्ट्रीय आंदोलन के जो भाषाई मूल्य महात्मा गांधी ने गढ़े थे, उन्हें पूरा करना हम सभी का दायित्व तो बनता ही है।


भारत आज विकसित भारत बनने की प्रक्रिया से गुजर रहा है। इस प्रक्रिया में हमें राष्ट्रीय एवं सामाजिक एकता की जरूरत है। ऐसे में भाषाई विवाद हमारी भविष्य की परियोजनाओं को कमजोर करेंगे। इस दौर को एक सर्वसमाहारी समरस राष्ट्र की जरूरत है। हमें आज अपनी सकारात्मक शक्तियों को इकट्ठा कर विकास की नई-नई राहों को खोजते रहना होगा। 
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कुंठित मन से मुक्त हो हिंदी के महाकवि निराला के शब्दों में हमें अपनी शक्ति की मौलिक कल्पना तो करनी ही होगी। नई शिक्षा नीति-2020 भारत के भविष्य का एक रोडमैप है। इसे हमें राजनीति से निरपेक्ष हो समाज के हित में देखना और समझना होगा। चुनाव आते-जाते रहेंगे, लेकिन विद्यार्थियों और युवाओं के जो दिन उनके हाथों से छूट जाएंगे, वे वापस नहीं आएंगे। पिछले दिनों हम लोग तमिलनाडु के विभिन्न भागों में एक परियोजना के सिलसिले में गए थे, वहां हमें कई जगह सुनने को मिल रहा था कि हिंदी विरोध की राजनीति ने हमारे भविष्य की अनेक संभावनाओं को अवरुद्ध कर दिया है। संभव है कि ये आवाजें स्टालिन के कानों में भी गूंजती होंगी।

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