चित्रगुप्त, यमराज की आवाज गूंजी।
जी, जहांपनाह!
सामने कुछ दिख रहा है तुम्हें?
हां हुजूर, यमदूत चार आत्माएं लेकर आ रहा है, चित्रगुप्त ने अपना चश्मा ठीक करते हुए कहा।
मगर जहां तक मुझे याद है, मैंने तो उसे दो के ही वारंट थमाए थे। तो ये दो साथ में एकस्ट्रा कहां से? अपने यजमानों के देश में क्या अभी टेक टू, गेट टू फ्री की सेल तो नहीं लगी है कि अपना यमदूत भी दो के साथ दो फ्री ले आया हो?
हुजूर, सेल तो अपने यजमानों के देश के बाजारों में अब बारहों महीने लगी रहती है, मगर जहां तक मेरी जानकारी है, वहां अभी आत्मा 'आइटम' नहीं हुई है।
तो यह सब क्या है?
हुजूर, मैंने अपने पीआरओ से पता किया, तो उसने बताया है कि वहां आजकल किसी व्यापम नामक गड़बड़झाले के चलते...
यमराज ने चौंककर पूछा, यह व्यापम क्या है चित्रगुप्त?
हुजूर, शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार देने वाला ग्रुप है।
...तो वह उन्हें मरने का रोजगार देता है, या पेट भरने का?
जब तक सीबीआई जांच पूरी नहीं हो जाती हुजूर, तब तक कुछ भी समझ लीजिए। मालूम हुआ है कि उसी गड़बड़झाले के चलते हम दो के वारंट अपने यमदूतों को देते हैं, पर उनके साथ जबर्दस्ती दो और भेज दिए जाते हैं।
तो यह बात है। अब आगे क्या?
अब क्या हुजूर, यह तो अब हमारी ही नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि सबको जगह दें।
मगर, यह धोखा-सोखा, मीठी गोली...
हुजूर, अपने यजमानों के देश में यह धोखा वगैरह सब आजकल लाइफ-स्टाइल का अनिवार्य हिस्सा है। वहां जनता से पैसे लिए जाते हैं इलाज के और उन्हें थमा दी जाती है मौत! वहां पैसे वसूले जाते हैं अमृत के और पिला दिया जाता है विष। जनता से पैसे लिए जाते है जवानी के और हाथ आता है बुढ़ापा।
बस, चित्रगुप्त बस! अब और कहकर मुझे रुलाओगे क्या? यह कहकर यमराज अगला केस सुनने में व्यस्त हो गए।