जल, जंगल, जमीन के साथ प्रकृति हमारे जीवन का आधार है। सिर्फ मनुष्य ही नहीं, सारी जीवसृष्टि इस पर निर्भर है। सभी एक दूसरे से जुड़े हैं, जिसे हम जीवन शृंखला कहते हैं। अगर इसकी एक कड़ी भी टूटती है, तो सारी व्यवस्था नष्ट हो जाती है। हम सभी प्रकृति के अभिन्न अंग हैं, इसलिए हमारी कुछ जिम्मेदारियां भी हैं। हमने प्रकृति के अनुरूप खुद को ढालने की जगह
अहंकारवश खुद को प्रकृति से ऊपर मान लिया। प्राकृतिक संसाधनों के-चाहे वह पानी हो, अन्न हो या मिट्टी-गलत प्रबंधन के कारण उसके गंभीर परिणाम हमें भुगतने पड़ रहे हैं। प्राकृतिक जल चक्र को खंडित कर हमने पानी का संकट खड़ा किया है।
जब हमने 21वीं सदी में प्रवेश किया, तब दुनिया भर में पर्यावरण को लेकर चिंतित लोगों ने विश्व पर्यावरण परिषद का आयोजन किया। पहली बार दुनिया भर के लोग इस पर सहमत हुए कि जैव विविधता के नुकसान से हमारे जीवन और पृथ्वी पर बड़ा संकट मंडरा रहा है। इसलिए जैव विविधता का संरक्षण जरूरी है, ताकि सबको न्यायोचित लाभ मिले। रियो डि जिनेरियो में हुए सम्मेलन में सभी देशों ने स्वीकार किया कि जैव विविधता प्रबंधन का सही काम लोग ही कर सकते हैं, कोई राज्य या केंद्रीय सत्ता नहीं।
भारत सरकार ने भी वर्ष 2002 में जैव-विविधता अधिनियम बनाया। इस कानून की धारा 41 में यह प्रावधान है कि ग्राम पंचायत, नगर पालिका, महानगर पालिका को अपनी जैव विविधता का सही प्रबंधन करने के लिए ऐसी समिति का गठन करना है। नए साल पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम जहां रहते हैं, अपनी आजीविका से जुड़े हैं, वहां हम अपने जीवन से जुड़े जल, जंगल, जमीन, जानवर, जैव-विविधिता के प्रबंधन के संबंध में अपनी छोटी ग्रामसभा (जो ग्राम पंचायत नहीं है) में सर्वसम्मति से निर्णय लेकर उस पर अमल करेंगे। मनुष्य द्वारा प्रकृति का सही प्रबंधन न हुआ, तो गरीबी, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता जैसा बड़ा संकट सामने से आ रहा है। विकास के नाम पर हमने प्रकृति से खिलवाड़ किया, जिससे हमारी संस्कृति, सभ्यता पर भी खतरा मंडरा रहा है। मोहनजोदड़ो का उदाहरण हमारे सामने है, जिसने पानी के बारे में नहीं सोचा, और वह सभ्यता खत्म हो गई।हमें उन गलतियों से सीखना होगा।
नए साल में हम यह संकल्प करें कि प्रकृति और जैव-विविधता के प्रति हमारी जिम्मेदारी है। और उसके प्रबंधन की जिम्मेदारी निभाने के लिए बुनियादी इकाई ग्राम सभा को हम धारा 41 के मुताबिक 'जैव विविधता प्रबंधन समिति' बनाएंगे। इन कानूनों पर सही ढंग से अमल हो, तो एक बड़े संकट से हम उबर सकते हैं। ग्रामसभा ही जैव विविधता प्रबंधन समिति, सामुदायिक वन प्रबंधन समिति और जल प्रबंधन समिति का दायित्व निभाएगी, तो सभी कानूनों से उसे शक्ति प्राप्त होगी। इसे मनरेगा से जोड़कर पैसे की समस्या का हल निकाला जा सकता है। ऐसा कर हम समता और अहिंसा पर आधारित समाज का निर्माण कर सकेंगे।