नाचना कोई जुर्म नहीं है। अगर उसकी तगड़ी फीस मिल रही हो तो और भी आनंदपूर्वक नाचा जा सकता है। रईस तबियत के लोग जब कभी आनंद से भर उठते हैं, तो उन्हें नाचने वालों की कतार लगाने का मन हो आता है।
नचवाना, उस नाच को देखना और नाच को देखते हुए औरों के द्वारा देखा जाना, रईसी का मौलिक लक्षण है। जो भी मौलिक रईस होता है, वह अपनी मौलिकता को उद्घाटित करने के लिए परम विलास का झंडा लहराता हुआ इसी प्रकार परम पद को प्राप्त होता है।
कोई जमाना था, जब यह तत्व परम-लोकल हुआ करता था। इलाके की रंगीनी पर इस प्रतियोगिता का मीटर चला करता था। जमाना बदला। सामंत गए, लोकतंत्र आया। कला ने सिर उठाकर हृदय से गाना शुरू किया, 'जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी'। कला उठी और मंदिर की तरफ जा ही रही थी कि लोकतंत्र पार्ट-टू शुरू हो गया।
अब ब्रांडिंग के कारीगरों ने 'आर्ट के आनंद की जय' कहते हुए रईसी का नया मार्केट खोल दिया है। जिन चेहरों और देहों को 'स्वप्निल' मानकर जनता डरी रहती थी, उन्हें शादियों में नाचते पाकर बेहोश हुई जा रही है।
करोड़ों की फिल्मों में कला के करोड़ कूटते हुए 'मुन्नी बदनाम हुई' का उद्घोष करती इस क्रांति पर दंगे से अनाथ हुआ बच्चा पूछता है, 'मां कहां है?' तो जवाब लखनऊ से आता है, 'चुप हो जाओ बेटे, अभी नाच चल रहा है। यह खत्म हो तो तुम्हारा इंतजाम भी देखेंगे।'
'क्या यह हद नहीं है? बच्चा अनाथ है, रो रहा है और आपकी नजर स्टेज पर नाचती नथ से नहीं हट रही?' मैंने उनसे पूछा।
वे पैर फैलाए, पीठ के बल सुस्ताए, बर्फीली हवाओं के विरुद्ध जबर्दस्त रोशनी और आग के इंतजाम के साथ ताल मिलाते बोले, 'तुम खर्चा गलत बता रहे हो। हमने इस नाच-गाने पर इतना खर्चा नहीं किया, जितना तुमने बताया। हम तो उससे भी ज्यादा कर सकते थे। हमने नहीं किया, क्या यही काफी नहीं है?'
मैंने कहा, 'मैं अनाथ बच्चे की पूछ रहा था। बजट और खर्चे पर तो बात ही शुरू नहीं हुई।'
उन्होंने कहा, 'मुझे मालूम है तुम आखिर में जाकर वहीं अटकोगे। बच्चे की बात बीच में लाओगे और बजट पर चले जाओगे। मैंने सोचा बाद का बयान पहले दे दूं।'
'नहीं, मैं सिर्फ इतना जानना चाहता हूं कि जब दंगों के मारे लोग ठिठुर रहे हों, बच्चों की आंख का आंसू जम गया हो, तब आप अपने सामने नाचता हुआ 'बंगाल से ले के यूपी वाया आगरा' वाला आनंद कैसे ले सकते हैं?'
'तार्किक रूप से यह तथ्य गलत है। जब नर्तकी यह गा रही थी, तब अपने एक वस्त्र-विशेष की विशेषता का विस्तार प्रकट कर रही थी। उसका कहना था कि उसकी चमकार बंगाल से लेकर यूपी तक है। यह और बात है कि वह आगरा से 'वाया' होती है। बहुत पहले एक गीत आया था, जिसमें नायिका नायक से आग्रह करती है कि वह आगरा से, वही वस्त्र-विशेष मंगवा कर दे। यह कला की परंपरा का हिस्सा है। जब परंपरा की बात चल रही हो, तो कला को संरक्षण देने की बात और महत्वपूर्ण हो उठती है।'
'कला के संरक्षण और दंगों की कला के बीच क्या कोई अंतर्सम्बंध नहीं है?'
'आप चीजों को बेवजह जटिल बनाते हैं। नाच से मन उत्फुल्ल होता है। उत्फुल्ल व्यक्ति, कुंठाओं से मुक्त होता है। दमित इच्छाओं और कुंठाओं से मुक्ति होने के बाद मन पवित्र हो जाता है। निर्मल होने के बाद व्यक्ति, बच्चे, आंसू या मां के बारे में अधिक संवेदनशील होकर सोच सकता है। क्या आप निर्मलता की इस आकांक्षा को विलास कहकर अपमानित नहीं कर रहे हैं?'
'नहीं, बंगाल से लेकर यूपी तक जो भी वस्त्र-विशेष गीत में नायिका की पुकार का आधार बनता हो, यदि वह वाया आगरा की बजाय वाया मुजफ्फरनगर हो जाए, तो आपकी निर्मलता की आकांक्षा धरी की धरी रह जाएगी।'
'आप अतिवादी, आम जन के उल्लास के विरोधी और आनंद को कुछ लोगों तक सीमित रखने वाले समता-विरोधी तत्वों के हाथ की कठपुतली जान पड़ते हैं। मैं आपको समाजवादी संस्कारों की शक्ति से खारिज करता हूं।' वे यह कहकर उठ खड़े हुए।
उन्हें एक माफिया को मुख्यधारा में लाने के लिए पार्टी मुख्यालय जाना था। जाने को तो वे मल्टीप्लेक्स में स्पेशल शो में चले जाते, लेकिन मुख्यधारा की चिंता, राष्ट्रीय कर्तव्य थी। वे कर्तव्य से कभी नहीं हटते। दावा है कि वे मजलूमों के लिए आनंद उगाते हैं और जनता के आनंद के लिए जरूरत पड़ने पर शोषकों के आनंद का अपहरण करने की थ्योरी में यकीन करते हैं।
एक चालू गीत, एक झटके, एक अदा से उन्होंने नायिका के 'बंगाल से यूपी वाया आगरा' के कलाबोध को आशीर्वाद दिया है।
अनाथ बच्चा दंगा शिविर में पूछता है, 'मुझे आशीर्वाद कब मिलेगा?'
चैरिटी के धंधे में लोग सुझा रहे हैं, उसे 'बुलेट राजा' और 'डेढ़ इश्किया' देखनी चाहिए।