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व्यवस्था की डोर तो उनके हाथ में है

Fri, 01 Feb 2013 12:27 AM IST
उदित राज
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समाजशास्त्री आशीष नंदी के जयपुर साहित्य उत्सव में दिए गए बयान कि ‘ज्यादातर भ्रष्टाचार में दलित, आदिवासी एवं पिछड़े वर्ग के लोग शामिल होते हैं', के कई पक्ष हैं। निर्विवाद रूप से यह इन वर्गों को कमतर रूप में दिखाता है और निंदनीय है। इस देश में जाति से ज्यादा कोई और शाश्वत एवं ताकतवर चीज नहीं है।
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मरते दम तक इंसान जाति से मुक्त नहीं हो पाता। देश छोड़कर किसी भी मुल्क में चला जाए, तो जातीय भावना भी साथ जाती है। नंदी के बयान पर तमाम तरह की टिप्पणियां आ रही हैं। कोई कह रहा है कि भ्रष्टाचार की जाति नहीं होती, तो कुछ ने कहा कि इस वाक्य को पूरे संदर्भ में देखा जाना चाहिए। जो उन्होंने कहा, वह वापस तो नहीं हो सकता, लेकिन जिस तरह निर्भया के बलात्कार के मामले में पूरे देश में बहस छिड़ी, अगर भ्रष्टाचार पर उसी तरह से बहस छिड़ जाए, तो कुछ मकसद हासिल हो सकता है।

दलित-आदिवासी औरों की तुलना में कम भ्रष्ट हैं, यह बहुत विश्वास के साथ कहा जा सकता है। पिछले वर्ष केंद्र सरकार ने 17 लोगों के (दो नंबर के) विदेशी खातों का खुलासा किया, उनमें से एक भी दलित और आदिवासी नहीं है। जैन हवाला कांड में इस वर्ग के लोग शामिल नहीं थे। हर्षद मेहता, केतन पारिख या तेलगी जैसे घोटालेबाजों में से भी कोई दलित या आदिवासी नहीं था।
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70,000 करोड़ रुपये के राष्ट्रमंडल खेल घोटाले में भी किसी दलित या आदिवासी का नाम नहीं आया। 2 जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस लेने वालों में कोई भी इस वर्ग का नहीं था, अलबत्ता जिस मंत्री के कार्यकाल में यह हुआ, वह जरूर दलित समाज से था। यह कहना गलत नहीं है कि दलित, आदिवासी अगर भ्रष्ट हैं, तो अपवाद स्वरूप अर्थात दाल में नमक के बराबर।

जिस जाति के हाथ में हजारों वर्ष से धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक सत्ता रही है, वही तो अन्य संस्थाओं को जन्म देता है। भ्रष्टाचार हमारे यहां एक संस्था का रूप ले चुका है। आजादी के बाद कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका की बागडोर ज्यादातर सवर्णों के पास रही है, लिहाजा यह कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार की बुनियाद उसी समय पड़ी। सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार धर्म के नाम पर होता है। देवी-देवताओं को प्रसाद, पैसा, चादर, सोना-चांदी आदि चढ़ाकर लाभ लेना भ्रष्टाचार नहीं तो और क्या है? असल में आशीष नंदी ने जो कहा, सच्चाई उसके उलट है। 
   
आशीष नंदी ने यह भी कहा कि बंगाल में भ्रष्टाचार कम है। इसका श्रेय उन्होंने वामपंथी सवर्ण नेताओं को दिया। उन्होंने यह भी कहा कि 100 वर्ष में दलित, आदिवासी एवं पिछड़ा नेतृत्व में नहीं है। अर्थात आर्थिक भ्रष्टाचार कम हुआ, पर सामाजिक भ्रष्टाचार का पलड़ा ज्यादा भारी है।

इससे वामपंथियों पर लगाया जाने वाला यही आरोप साबित होता है कि वे सबसे ज्यादा ब्राह्मणवादी हैं। आशीष नंदी के बयान से इस सोच को समर्थन मिला। यह कैसे संभव है कि लगभग 80 प्रतिशत दलित, आदिवासी एवं पिछड़ों की आबादी हो और उसमें से नेतृत्व न पैदा हो। क्या मान लिया जाए कि ये मूर्ख एवं अयोग्य होते हैं?

जिस तरह से भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के संघर्ष पर देश में बहस छिड़ी, उसी तरह इस विषय पर देश में संवाद होना चाहिए कि कौन जाति ज्यादा भ्रष्ट है और कौन नहीं। बहस से स्पर्धा होगी और जो जातियां ज्यादा भ्रष्टाचार कर रही हैं, उनके ऊपर मनोवैज्ञानिक और मानसिक दबाव पड़ेगा। इससे भ्रष्टाचार में कमी होगी।

कुछ दिन पहले इसी मुद्दे पर दिल्ली में एक विचार गोष्ठी रखी गई थी। वहां पर अन्ना हजारे से पूछा गया कि विगत वर्ष की तुलना में इस वर्ष भ्रष्टाचार बढ़ा है, तो उनके अनशन से क्या फायदा हुआ। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार मिटाने के लिए गांव में जाना होगा। मैंने कहा कि छह लाख से ज्यादा गांव भारत में हैं, तो कैसे ये संभव होगा और इसमें कितने हजार साल लगेंगे। आखिर खुद उन्होंने पूरा जीवन एक गांव को सुधारने में लगा दिया।
 
आर्थिक भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई तब तक सफल नहीं होगी, जब तक कि बौद्धिक भ्रष्टाचार को मान्यता न मिले और उसको मिटाने के लिए लगातार संघर्ष हो। यह बात तो तय है कि यदि जाति और भ्रष्टाचार में बहस चले, तो इसके परिणाम अच्छे निकलेंगे।
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