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मुद्दा: देर आए, दुरुस्त आए... सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अमल से जाति भेद और पक्षपात समाप्त होगा

श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Thu, 10 Oct 2024 05:26 AM IST

सार

जेल में जातियों के आधार पर काम के बंटवारे की कुप्रथा को समाप्त करने का अदालती निर्णय भले विलंब से हुआ हो, लेकिन न्यायोचित कदम है।
 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी


खैर ‘देर आए, दुरुस्त आए’ वाली कहावत के अनुसार, जो हुआ, अच्छा हुआ। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के खाते में यह निर्णय भी ऐतिहासिक होगा। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 15 में दिए गए, जाति-धर्म के आधार पर भेदभाव से नागरिकों का संरक्षण कर अपने सांविधानिक दायित्व का निर्वाह किया है। बड़ी बात यह कि अदालत ने जेलों में चल रहे असांविधानिक भेदभाव का स्वतः संज्ञान लिया है। जिन कैदियों के अधिकारों का हनन हुआ, उनकी नागरिक गरिमा की जो क्षति हुई, उसकी भरपाई होना तो संभव ही नहीं है।


ऊंची जाति के कैदियों को खाना पकाने और कथित नीची जातियों के कैदियों से सफाई कराने, झाड़ू लगाने जैसे कार्य लेना अुनच्छेद 15 का खुला उल्लंघन था। अब तक पूर्व के किसी भी न्यायाधीश का इस ओर ध्यान क्यों नहीं गया? मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं ने यह प्रश्न क्यों नहीं उठाया? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि, ‘कौन खाना बना सकता है? कौन नहीं।’ ये छुआछूत के पहलू हैं। कानून इनकी अनुमति नहीं देता।


उपाय के तौर पर अदालत ने जेल प्रशासन को निर्देशित किया कि ‘जेल के अंदर विचाराधीन या दोषी कैदियों के रजिस्टर में जाति का कोई भी संदर्भ न रखा जाए।’ इन निर्देशों का विचारणीय दूरगामी संदेश यह है कि जातिगत भेदभाव के उद्गम स्थान को जाना जाए। जेलों में जाने वाले हों या शिक्षा, चिकित्सा, शासन-प्रशासन, कला-सिनेमा, उद्योग आदि किसी भी क्षेत्र में जो विचार-व्यवहार हम लेकर जाते हैं, उन्हें अपने समाजों से अपने घरों और परिवारों के स्वभाव संस्कारों से ग्रहण करके आते हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने ‘जूठन’ (आत्मकथा) में लिखा, ‘मेरे स्कूल मास्टर ने मुझसे कहा-तेरा काम तो सफाई करना है। इसलिए सामने खड़े नीम की टहनियां तोड़कर, झाड़ू बना ले और स्कूल का मैदान साफ कर दे।’


हमारे न्यायालयों के लिए देशव्यापी जातिभेद की संभावनाओं को समाप्त करने के लिए समाज में संचालित जेल से बाहर की संस्थाओं का भी संज्ञान लेना अपेक्षित होगा। ऐसा क्या हो, जो प्राथमिक स्कूलों से लेकर आईआईटी, मेडिकल यूनिवर्सिटी, राज्य लोक सेवा, संघ सेवा आयोग, कला सिनेमा इत्यादि में प्रवेश लेने वाले की जाति प्रवेश पाने या न पाने का सबब न बने। स्कूल रजिस्टरों में नाम के साथ जाति लिखना रोका जाए। यदि जाति आधारित सरकारी मदद-छात्रवृत्ति आदि कुछ हो, तो उसका रजिस्टर अलग और गोपनीय रखा जाए।


उदाहरण के लिए बिहार लोक सेवा आयोग में एक अच्छी व्यवस्था है। सहायक आचार्यों के चयन हेतु साक्षात्कारों में उम्मीदवारों को उनके नाम व जाति से नहीं बुलाया जाता। उन्हें कोड नंबर दिया जाता है, लेकिन कई विश्वविद्यालयों में खासकर शोध छात्रों के साक्षात्कारों में जाति प्रदर्शित होती है, जिसमें परीक्षकों के पूर्वाग्रहों के प्रभावी होने की आशंका बनी रहती है। अच्छा हो साक्षात्कार समितियों के समक्ष पात्र की योग्यता आए, जाति नहीं। परीक्षकों को जाति पूछने से भी रोका जाए। वे आवेदन, जिसमें जाति अंकित हो साक्षात्कार बोर्ड के सामने ही नहीं आने चाहिए। साक्षात्कार के अंक भी कम से कम होने चाहिए। गरीब और कथित नीची जातियों से आने वाले खासकर दलित, आदिवासी छात्रों की पोशाक को लेकर टिप्पणियां कर दी जाती हैं।


ज्ञान के क्षेत्रों में भी अब एकलव्य से अंगूठा लेने के बजाय उसकी प्रतिभा का राष्ट्र के लिए उपयोग होना चाहिए। जेलों से ही क्यों, खेलों से भी जाति, लिंग और धर्म-भेद हटा दिए जाने चाहिए। एक क्षेत्र का निर्देश दूसरे क्षेत्र के लिए नजीर होती है। भारत विकसित राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है। साथ ही सुशिक्षित, सभ्य, आधुनिक और लोकतांत्रिक भी। समझदार को इशारा ही काफी होता है। कोर्ट ने बाकायदा निर्देश जारी किए हैं। अमल होगा, तो जाति भेद और पक्षपात समाप्त होगा और भारतीय संविधान के अनुच्छेद-15 की रक्षा हो सकेगी। -लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में वरिष्ठ प्रोफेसर व साहित्यकार हैं।

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