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आत्महत्या और समाज: तीन दशकों में भारत में 31.5 प्रतिशत घटा सुसाइड; 'अपना जीवन खत्म करना' अब भी बड़ी चुनौती

ऋतु सारस्वत
Updated Thu, 13 Mar 2025 03:44 AM IST

सार

भारत में आत्महत्या से होने वाली मृत्युदर में 1990 से 2021 के मध्य 31.5 प्रतिशत की कमी आई है, लेकिन यह अब भी बड़ी चुनौती है।
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सुसाइड अब भी चिंताजनक (प्रतीकात्मक) - फोटो : अमर उजाला

 

विभिन्न शोध बताते हैं कि आत्महत्या मानसिक विकारों से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है। वर्ष 2022 में पीयू रिसर्च का अध्ययन ‘मेंटल हेल्थ कंडीशन कैन कॉन्ट्रिब्यूट द सुइसाइड रिस्क’ भी इस तथ्य की पुष्टि करता है कि मानसिक विकार आत्महत्या के कुछ प्रमुख कारणों में से एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, ‘मानसिक स्वास्थ्य मानसिक कल्याण की एक स्थिति है, जो लोगों को जीवन की मुश्किलों से निपटने, अपनी क्षमताओं का एहसास कराने, हालातों से सबक लेने, अच्छी तरह से काम करने और अपने समुदाय के लिए योगदान करने में सक्षम बनाती है।’ खराब मानसिक स्वास्थ्य व्यक्ति विशेष के लिए ही नहीं, अपितु समाज और देश के लिए भी हानिकारक है।


अध्ययन बताते हैं कि भारत पर आत्महत्या का वार्षिक वित्तीय बोझ 1.40 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। शोधकर्ताओं का कहना है कि आत्महत्या के सबसे अधिक मामले 20-34 आयु वर्ग से आते हैं, जो राष्ट्रीय आर्थिक बोझ के 53 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार हैं। ‘मानसिक स्वास्थ्य’ एक मूक महामारी के रूप में भारत में अपना शिकंजा फैला रहा है। जागरूकता की कमी, समाज का डर और पेशेवरों की कमी के कारण मानसिक विकार वाले 70 से 92 प्रतिशत लोगों को इलाज उपलब्ध नहीं हो पाता है। अक्तूबर 2022 में सरकार द्वारा ‘राष्ट्रीय टेली मानस हेल्पलाइन’ आरंभ की गई, जो कि मानसिक संकट का सामना कर रहे व्यक्तियों को परामर्श संबंधी सेवाएं प्रदान करती है। 7 फरवरी, 2025 तक 18.1 लाख से अधिक लोगों ने इस सेवा का लाभ उठाया है।


राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति का लक्ष्य 2030 तक आत्महत्या मृत्यु दर को 10 प्रतिशत तक कम करना है। इस दिशा में सबसे बड़ी चुनौती मनोचिकित्सकों की कमी है। इंडियन जनरल ऑफ साइकाइट्री के अनुसार, भारत में प्रति एक लाख लोगों पर 0.75 मनोचिकित्सक हैं, जबकि डब्ल्यूएचओ प्रति लाख कम से कम तीन मनोचिकित्सकों की सिफारिश करता है।


स्वभावगत महिलाओं को अति संवेदनशील व भावुक समझा जाता है और पुरुषों को कठोर व असंवेदनशील, परंतु आत्महत्या के वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि पुरुषों में महिलाओं की तुलना में आत्महत्या की आशंका ज्यादा है। 2021 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 3,14,000 पुरुषों और 74,800 महिलाओं ने खुदकुशी की थी। विश्व भर में पुरुषों के लिए सांस्कृतिक प्रतिमान लगभग समान हैं। यह सांस्कृतिक प्रतिमान ‘पुरुषत्व’ को शक्तिशाली व पीड़ा विहीन व्यक्तित्व के मापदंड से आंकते हैं। पुरुषत्व की यह परिभाषा उनसे उनकी भावनाओं की अभिव्यक्ति छीन लेती है।

 

समाजशास्त्री ऐनी क्लेरी द जैंडर्ड लैंडस्केप ऑफ सुइसाइड : मस्क्युलिनिटीज, इमोशंस एंड कल्चर में लिखती हैं कि पुरुषों को हताशा, पीड़ा और पराजय जैसी भावनाओं को छिपाने के लिए बाध्य किया जाता है। विलियम्स, हचेंस, कोबेन व हेमिंग्वे का अध्ययन व्हाई डू मेंस कमिट सुइसाइड ऑफन दैन वुमन बताता है कि सामाजिक रूढ़ियां पुरुषों की भावनात्मक आवश्यकताओं को इस सीमा तक नजरअंदाज करती हैं कि वे अवसाद, अकेलेपन, निराशा या तनाव से निपटने में असमर्थ हो जाते हैं, जिसका परिणाम खुदकुशी के रूप में सामने आता है। रोब ब्हिटली मेंस इश्यूज एंड मेंस मेंटल हेल्थ में पुरुष एवं पुरुषत्व के बारे में समाज को एक नया दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। रॉब लिखते हैं कि अगर पुरुष, पुरुषत्व की घातक जकड़न से मुक्त नहीं होंगे, तो उनके लिए मानसिक स्वास्थ्य एक बहुत बड़ी चुनौती बनकर उभरेगा।


पुरुषों में बढ़ती आत्महत्या और उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए ऑस्ट्रेलिया में अनूठी पहल की गई। ‘मेन्स टेबल’ देखभाल का वह मॉडल है, जहां पुरुषों को अपनी बात साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।  ‘स्वस्थ पुरुषत्व, स्वस्थ समुदाय’ यह मुहिम ऑस्ट्रेलिया  से निकल कर अन्य देशों में भी फैल रही है। समझना होगा कि दर्द, हताशा व निराशा दैहिक अंतर का विभेद नहीं करती। इसलिए पुरुषों को भी स्त्री की भांति अपनी भावनाओं को बेझिझक अभिव्यक्त करने का अधिकार है और अगर सामाजिक वर्जनाएं तथाकथित पुरुषत्व के नाम पर उनको ऐसा करने से रोकेंगी, तो यह न तो मानवता और न ही किसी भी समाज के लिए हितकारी होगा।

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