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राहुल का आत्मघाती ब्रह्मास्त्र

Sun, 29 Sep 2013 07:51 PM IST
देवप्रिय अवस्थी
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लंबी नींद से अचानक जागे कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछले दिनों दागी सांसदों-विधायकों की सदस्यता बचाने के अध्यादेश को फाड़कर फेंक देने का बयान देकर अपनी सरकार की फजीहत तो की ही, विपक्ष के अध्यादेश-विरोधी सुरों की धार को भोथरा करने का बचकाना उपक्रम भी किया है। हालांकि बाद में उन्होंने स्थिति को सामान्य बनाने की कोशिश की और प्रधानमंत्री पर भरोसा जताते हुए उनसे दिशा-निर्देश लेने की बात कही, लेकिन जो नुकसान होना था, वह तो हो चुका।
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उन्होंने जिस समय और जिस अंदाज में यह बयान दिया, उससे यह साफ जाहिर है कि उन्होंने और उनके सिपहसालारों ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को दरकिनार करने की योजना पर अमल तेज कर दिया है। अन्यथा कोई कारण नहीं था कि वाशिंगटन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की मुलाकात से ऐन पहले नई दिल्ली में इस तरह का बयान दिया जाता। राहुल गांधी और उनके सिपहसालारों से यह सवाल पूछा जाना बहुत स्वाभाविक है कि जब कांग्रेस की कोर कमेटी और केंद्रीय मंत्रिमंडल में संबंधित अध्यादेश पर विचार हो रहा था, तब उन्होंने जिम्मेदार लोगों को अपनी राय से अवगत क्यों नहीं कराया था। यही नहीं, उनके बयान के बाद कांग्रेस के जो नेता और मंत्री उनकी हां में हां मिलाते देखे गए, उन्हें पहले यह इलहाम क्यों नहीं हुआ कि यह अध्यादेश देश की जनभावनाओं के साथ भद्दा मजाक है?

कोई स्वाभिमानी प्रधानमंत्री होता, तो अपनी अमेरिका यात्रा बीच में छोड़कर देश लौटता और हवाई अड्डे से सीधे राष्ट्रपति भवन जाकर प्रणब मुखर्जी को अपना इस्तीफा सौंप देता, पर बेचारगी की सारी हदें पार कर चुके डॉ. मनमोहन सिंह से इस तरह की उम्मीद करना शायद व्यर्थ है। जो प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत को बलाए ताक रख चुका हो, जिसकी नाक के नीचे मंत्री-दर मंत्री भ्रष्टाचार के नए-नए रिकॉर्ड बनाने की होड़ कर रहे हों और जिसके राजनीतिक आका जब-तब उसे आईना दिखाते रहते हों, उसकी बेचारगी पर तो केवल तरस ही खाया जा सकता है।
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दीगर है कि 10, जनपथ से फरमान आने पर मनमोहन सिंह इस्तीफा देने में एक मिनट की भी देर नहीं लगाएंगे, लेकिन 10, जनपथ है कि राहुल की ताजपोशी के लिए फिलहाल और इंतजार करने की नीति पर चल रहा है। शायद उसे सरकार और पार्टी के बीच दरार चौड़ी होने का आभास कराने में वोटों की झोली भरती हुई नजर आ रही है। लेकिन जिस सरकार की नकेल पर 10, जनपथ का पूरा नियंत्रण हो, उसके कामकाज की जवाबदेही से वह भला कैसे इनकार कर सकता है? जो कुछ अच्छा हुआ, उसका श्रेय 10, जनपथ को देने और जो बुरा हुआ, उसकी तोहमत 7, रेसकोर्स रोड पर मढ़ने की कोशिशें परवान चढ़ने से तो रहीं।

इसमें किसी को कोई शक नहीं है कि आज की तारीख में राहुल गांधी कांग्रेस के सर्वोपरि नेता हैं-यहां तक कि वह पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी बड़े। कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व भी उन्हें विरासत में मिला है। वह जो कहेंगे या करेंगे, तमाम कांग्रेसजन उसका अनुसरण करेंगे। न केवल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, बल्कि उनका एक-एक मंत्री 10, जनपथ द्वारा नामित किया गया है। क्या मजाल है कि उनमें से कोई भी सोनिया गांधी-राहुल गांधी की मंशा के विपरीत कुछ बोल या कर सके। इसलिए राहुल गांधी की भृकुटि तनने के बाद दागी नेताओं को बचाने वाले अध्यादेश को फाड़कर फेंका जाना ही उसकी नियति है। लेकिन जो ताबेदार अध्यादेश की इस नियति का श्रेय राहुल गांधी को देने के लिए उतावले हो रहे हैं, उन्हें किसी तरह की गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए। वास्तव में अध्यादेश की इस गति और नियति का सबसे ज्यादा श्रेय देश की आम जनता को मिलना चाहिए। हां, इस श्रेय में कुछ-कुछ हिस्सेदारी राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, सर्वोच्च न्यायालय और विपक्षी दलों को भी दी जा सकती है, जिनकी दागी जनप्रतिनिधियों के बारे में राय जग-जाहिर है। इसमें राहुल गांधी का योगदान तो इतना भर है कि उन्होंने अपनी ही पार्टी की अगुआई वाली सरकार के एक महत्वपूर्ण फैसले के ताबूत पर एक और कील जड़ दी है।

सोनिया गांधी की अगुआई में कांग्रेस दरअसल अपने बेहद बुरे दिन देख रही है। राहुल गांधी के नेतृत्व में वह और भी बदतर दिन देखने को आमादा प्रतीत होती है। राहुल गांधी का बयान रूपी ब्रह्मास्त्र सरसरी तौर पर किसी दूसरे से ज्यादा खुद को नुकसान पुहंचाने वाला ही नजर आता है। यह भी सच है कि सरकार और पार्टी के बीच दरार का नाटक ज्यादा तालियां बटोर पाने की पात्रता नहीं रखता।

अब भले ही सोनिया और राहुल गांधी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व पर भरोसा जताते दिख रहे हैं, लेकिन यह क्यों न माना जाए कि यह ब्रह्मास्त्र दागकर डॉ. मनमोहन सिंह की जगह किसी अन्य की ताजपोशी करने की जुगत भिड़ाई जा रही है! लेकिन यह बहुत साफ-साफ समझ लेना चाहिए कि शिखर पर इस संभावित बदलाव से सरकार या कांग्रेस का ज्यादा भला होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। इससे कांग्रेस को नुकसान होने की आशंका ही ज्यादा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में अब इतने दिन नहीं बचे हैं कि यूपीए सरकार और कांग्रेस की छवि सुधारने की कोई कवायद कोई खास रंग दिखा सके। फिलहाल कांग्रेस की एकमात्र उम्मीद नरेंद्र मोदी के प्रति जनता के एक हिस्से का खौफ है। पर इस खौफ को वोट में तब्दील करने के लिए जो ठोस रणनीति चाहिए, कांग्रेस में वह इस समय दूर-दूर तक नजर नहीं आती है।
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