देश के पांच करोड़ गन्ना उत्पादक किसान केंद्र सरकार की दोषपूर्ण गन्ना मूल्य व चीनी नीति के कारण संकट में हैं। गन्ना मूल्य निर्धारित करते समय केंद्र तथा राज्य सरकारें संगठित शुगर लॉबी के दबाव में रहती हैं। केंद्र सरकार द्वारा गन्ना उत्पादन मूल्य आकलन की पद्धति भी आधारहीन, त्रुटिपूर्ण एवं काल्पनिक है।
मूल्य निर्धारण केवल चीनी के मूल्य को आधार मानकर किया जाता है। प्रति क्विंटल चीनी उत्पादन मूल्य जो चीनी मिलें प्रस्तुत करती हैं, उन्हीं को प्रामाणिक मान लिया जाता है। इन आंकड़ों की प्रामाणिकता की जांच के लिए कोई स्वतंत्र एजेंसी नहीं है। इसमें चीनी मिलों को शीरा, खोई, मैली के लाभ के अतिरिक्त ऐथनॉल, विद्युत उत्पादन, अल्कोहल आदि उप उत्पादों से प्राप्त लाभ का आकलन भी नहीं किया जाता है। चीनी मिलों को यदि लाभ न होता, तो वह एक मिल से कई-कई मिल स्थापित नहीं करतीं। दूसरी ओर प्रत्येक वर्ष किसानों को पहले गन्ना मूल्य और बाद में उसके भुगतान के लिए संघर्ष करना पड़ता है। हाल के वर्षों में उनका संघर्ष सड़कों पर भी दिखता रहा है।
केंद्र सरकार की दोषपूर्ण गन्ना मूल्य नीति के कारण लगभग चार वर्ष के अंतराल पर गन्ने और चीनी उत्पादन में उतार-चढ़ाव होता रहता है। दोषपूर्ण नीतियों के कारण चीनी मिलों, बिचौलियों, जमाखोरों और भ्रष्ट राजनीतिकों को लाभ हुआ और चीनी मिलों के शेयरों में भी जबरदस्त उछाल आया। मगर इस लाभ में किसानों की भागीदारी कम रही है।
केंद्र सरकार ने 2009-10 में भारतीय गन्ना नियंत्रण अधिनियम, 1966 में संशोधन करके गन्ना मूल्य नियंत्रण अध्यादेश, 2009 जारी किया था। इस अध्यादेश में तीन (बी) तथा पांच (ए) को हटा दिया गया था। तीन (बी) में राज्यों को गन्ना मूल्य निर्धारित करने का अधिकार था।
इस कानून का सभी विपक्षी पार्टियों और किसान संगठनों ने विरोध किया और लाखों किसानों ने दिल्ली में विरोध किया था, जिसके आगे झुककर सरकार ने तीन (बी) को शामिल करने का फैसला किया, पर पांच (ए) को, जिसमें चीनी मिलों के लाभ में किसानों की भागीदारी होती है, शामिल नहीं किया।
वास्तव में गन्ना उत्पादन लागत लगातार बढ़ती जा रही है। पिछले एक वर्ष में मजदूरी की लागत में 25 प्रतिशत, डीजल की कीमत में 13 प्रतिशत, डीएपी उर्वरक में 96 प्रतिशत, भूमि के किराये में 25 प्रतिशत, खेत की जुताई व कटाई में 33 और 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। विद्युत आपूर्ति तीन-चार घंटे से अधिक नहीं होती, इस कारण अधिकांश सिंचाई ट्रैक्टर या जनरेटर से करनी पड़ती है।
इन कारणों से गन्ना उत्पादन लागत पिछले वर्ष के 268 रुपये प्रति क्विंटल के मुकाबले 46 रुपये बढ़कर 314 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है। राष्ट्रीय कृषि आयोग के अध्यक्ष डॉ स्वामीनाथन के फॉरमूले और हुड्डा कमेटी की सिफारिशों के अनुसार, समर्थन मूल्य 50 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 471 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए।
केंद्र सरकार चीनी मिल लॉबी के दबाव में रंगराजन समिति की चीनी उद्योग को नियंत्रण मुक्त करने की सिफारिश लागू करना चाहती है। इससे राज्यों को गन्ना मूल्य तय करने तथा मिलों का गन्ना क्षेत्रफल सुरक्षित करने का अधिकार समाप्त हो जाएगा और किसानों को केंद्र सरकार के उचित एवं लाभकारी मूल्य पर निर्भर रहना पड़ेगा। सहकारी चीनी मिल भी निजी मिलों के मुकाबले में नहीं टिक पाएंगी और मिलों की मनमानी से किसान बरबाद हो जाएंगे।
केंद्र सरकार द्वारा एक ओर चीनी लॉबी के दबाव में निर्णय लेने से किसान घाटे में हैं, दूसरी ओर देश में गैर कृषि पदार्थों के मूल्य लगातार बढ़ रहे हैं। किसान, जो देश का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है, महंगी औद्योगिक एवं उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद और अलाभकारी गन्ना मूल्य मिलने से दोहरी मार झेल रहा है। हास्यास्पद स्थिति तो यह है कि अब न्यायालय को किसान के उत्पादों के भाव तय करने पड़ रहे हैं।
क्या ऐसा लोहा, सीमेंट और दूसरे औद्योगिक उत्पादों के मूल्य निर्धारण में होता है? केंद्र सरकार को गन्ना व चीनी मूल्य नीति में तत्काल बदलाव करके उसे दूरदर्शी बनाना चाहिए, जिससे किसानों को बढ़ते उत्पादन मूल्य के अनुसार लाभकारी मूल्य मिल सके।