फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

Narikurwar community: रंग लाया नारिकुरवार समुदाय का संघर्ष

सार

स्वास्थ्य, शिक्षा एवं औपचारिक रोजगार तक नारिकुरवार समुदाय की पहुंच सीमित है। पिछले छह दशकों से ये लोग गरीबी से बाहर निकलने और बुनियादी अधिकारों तक पहुंच बनाने का
सपना देखते रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
संसद - फोटो : ANI


स्वास्थ्य, शिक्षा एवं औपचारिक रोजगार तक नारिकुरवार समुदाय की पहुंच सीमित है। पिछले छह दशकों से ये लोग गरीबी से बाहर निकलने और बुनियादी अधिकारों तक पहुंच बनाने का सपना देखते रहे हैं। अब जाकर उन्होंने अपनी पहचान के पहले कदम के रूप में कानूनी दर्जा हासिल किया है। आरक्षण की मौजूदा प्रणाली उनके अधिकारों और  सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक गतिशीलता तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करती है। अब तक नारिकुरवारों को सबसे पिछड़े वर्ग (एमबीसी) के रूप में मान्यता दी गई थी, पर इससे शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों में उनकी पहुंच सीमित ही रही। तैंतीस वर्षीय उच्च शिक्षित नारिकुरवार नेता राजशेखरन जानते हैं कि शिक्षा से क्या लाभ होते हैं, और उन्हें यकीन है कि जब नारिकुरवारों की नई पीढ़ी औपचारिक शिक्षा पाएगी, तो वह अपने समुदाय की नियति को बदलने में सक्षम होगी। 


उनके मुताबिक, अभी वे संसाधनों एवं अन्य चीजों के लिए ज्यादा ताकतवर समुदायों के साथ आरक्षित सीटों पर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। तमिलनाडु में अन्य एमबीसी समुदाय बेहतर संगठित हैं, अधिक सामाजिक-आर्थिक संसाधनों के साथ शिक्षित हैं, इसलिए वे अधिकारों तक पहुंच बना रहे हैं। इसलिए राजशेखरन नारिकुरवारों को एमबीसी से एसटी दर्जा दिए जाने के प्रबल समर्थक हैं। नारिकुरवार समुदाय विशिष्ट आदिवासी समूह नहीं है, जो स्पष्टतः एसटी कोटे के अंतर्गत आता है। एसटी दर्जे का दावा करने वाले अन्य समुदायों के विपरीत नारिकुरवार पैतृक जमीन का दावा नहीं करते, पर खानाबदोश के रूप में पहचाने जाते हैं और खुद को आपराधिक समुदायों से अलग करने की कोशिश करते हैं। 


उन्हें अक्सर उन नेताओं का समर्थन नहीं मिलता, जो इस छोटे से समुदाय को महत्वपूर्ण वोट बैंक नहीं मानते। उन्हें एसटी समुदायों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है, जो सीमित संसाधनों औरआरक्षित सीटों को एक और समुदाय के साथ साझा नहीं करना चाहते। एसटी का दर्जा पाने से पहले इस समुदाय को कई राजनीतिक मोर्चों पर जूझना पड़ा। उनके संघर्ष ने तीन दशक पहले राजनीतिक आकार लेना शुरू किया, जब उन्होंने राज्य सरकार के सामने अर्जी लगाई और कई राजनेताओं ने उनके प्रति सहानुभूति जताई। लेकिन तमिलनाडु की राजनीति किसी भी अन्य राज्य की राजनीति की तरह अस्थिर है। सरकार बदलने के बाद इस समुदाय ने अपना समर्थन खो दिया, पर वहा डिगा नहीं। इसने सत्ता में बैठी सरकार के पास अर्जी दी। 


कई पत्र लिखे, लेकिन वे अनुत्तरित रह गए। जब इन लोगों ने देखा कि कोई सुनवाई नहीं हो रही है और उनके लिए दरवाजे नहीं खुल रहे, तो उन्होंने वैकल्पिक रास्ते तलाशने शुरू किए। राज्य सरकार का पीछा करने के साथ उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान केंद्रित किया। वर्ष 2016 से वे दिल्ली की संगठित यात्राएं कर रहे थे और कठिन मौसमी स्थितियों के बावजूद जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल कर रहे थे। मीडिया की उपेक्षा के बावजूद वे अपनी मांग पर डटे रहे। नारिकुरवारों को एसटी सूची में जोड़ने का विधेयक कई बार लोकसभा में पेश किया गया। वर्ष 2016 में यह उसी दिन लोकसभा के पटल पर चर्चा के लिए रखा गया था, जिस दिन प्रधानमंत्री मोदी ने अचानक नोटबंदी की घोषणा की थी। नतीजतन देश भर में अफरातफरी के चलते उस विधेयक पर चर्चा नहीं हो पाई। उस झटके के बावजूद वापस तमिलनाडु लौटकर नारिकुरवारों ने अपने समुदाय के सामने तथ्यों को पेश किया और उन्हें एसटी का दर्जा पाने के महत्व के बारे में बताया।


इस बार उनके राजनीतिक प्रयासों ने अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया। जनसंचार माध्यमों की मदद से नारिकुरवारों ने अंतरराष्ट्रीय समर्थन की वकालत की और वैश्विक विद्वानों और संगठनों के साथ नियमित रूप से जुड़े रहे। इस क्रम में उन्होंने अपना एक अलग नाम रखा। कई सामूहिक प्रयासों के फलस्वरूप आज नारिकुरवार समुदाय अपने नए अधिग्रहीत एसटी दर्जे का भारी उम्मीद के साथ जश्न मना रहा है। अनुसूचित समुदाय की 53 वर्षीय सचिव अनुराधा कहती हैं, ‘इस एसटी दर्जे के माध्यम से वर्षों के संघर्ष के बाद हम शिक्षा, रोजगार के अवसर, आजीविका और अन्य महत्वपूर्ण आवश्यकताओं तक पहुंच सकते हैं।’ 


नारिकुरवारों की जीत सामाजिक न्याय प्राप्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम है-एक ऐसा कदम, जो यह साबित करता है कि विभिन्न राजनीतिक स्तरों पर अथक और जटिल रणनीति बनाने से किसी समुदाय को सफलता मिल सकती है। लेकिन यह केवल शुरुआत है। भारत में आरक्षण प्रणाली की अक्सर आलोचना की जाती है, इसे खत्म करने या इसका विस्तार करने के लिए तर्क दिए जाते हैं। सात दशक से भी पहले बनाई गई इस व्यवस्था में आज भारत की गतिशीलता को प्रतिबिंबित करने के लिए सुधार और परिवर्तन की आवश्यकता है। इस क्रम में चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा और वंचित समूहों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक गतिशीलता के लिए एक मार्ग बनाना होगा।
विज्ञापन


-लेखिका न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में लिबरल स्टडीज में क्लिनिकल असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next