भारतीय न्याय संहिता ने संगठित अपराध, आतंकवाद, और भीड़ हत्या जैसे अपराधों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है। हालांकि, कई प्रावधान आईपीसी से मिलते-जुलते हैं, पर यह निरंतरता और परिवर्तन के बीच संतुलन बनाने का एक व्यावहारिक तरीका माना जा रहा है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ने प्रक्रिया संबंधी कानून में क्रांतिकारी बदलाव लाया है। अब नागरिक जीरो एफआईआर और ई-एफआईआर दर्ज कर सकते हैं तथा केस फाइलें और चार्जशीट डिजिटल रूप में तैयार की जा रही हैं। जांच अधिकारियों को स्मार्टफोन और टैबलेट उपलब्ध कराए गए हैं, ताकि वे घटनास्थल से तुरंत साक्ष्य एकत्र और अपलोड कर सकें। उत्तर प्रदेश इस दिशा में अग्रणी राज्यों में से है। राज्य के सभी 75 जिलों में मोबाइल फॉरेंसिक वैन तैनात की गई हैं। करीब 40,000 जांच अधिकारियों को स्मार्टफोन और टैबलेट प्रदान किए गए हैं। इसके अलावा, 60,000 नए भर्ती पुलिसकर्मियों के लिए एक नया पाठ्यक्रम तैयार किया गया है, जिसमें नए कानूनों को शामिल किया गया है, ताकि वे शुरू से ही नई विधिक व्यवस्था में प्रशिक्षित हो सकें। ई-प्रॉसिक्यूशन प्रणाली, मालखानों का डिजिटलीकरण और पुलिस थानों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कक्षों की स्थापना जैसे उपाय सक्रिय रूप से लागू किए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश ‘ई-प्रॉसिक्यूशन पोर्टल’ के उपयोग में अग्रणी राज्य है। बीएनएसएस के अंतर्गत मोबाइल फॉरेंसिक साइंस यूनिट्स का विस्तार प्रमुख सुधार है। साथ ही फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाओं (एफएसएल) को उन्नत किया जा रहा है, ताकि वे साइबर अपराध और डीएनए परीक्षण जैसे जटिल मामलों की जांच कर सकें।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम डिजिटल युग की मांगों के अनुरूप साक्ष्य कानून को अद्यतन करता है। अब ईमेल, मेटा डाटा, सीसीटीवी फुटेज, जीपीएस डाटा और यहां तक कि ब्लॉकचेन रिकॉर्ड को भी कानूनी साक्ष्य के रूप में मान्यता दी गई है। प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए हैश वैल्यू और डिजिटल सिग्नेचर अनिवार्य कर दिए गए हैं।
अदालतें अब ई-गवाही व वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये विशेषज्ञ साक्ष्य स्वीकार कर सकती हैं। विशेष रूप से 22 राज्य व केंद्रशासित प्रदेशों ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा विकसित ई-साक्ष्य एप को अपनाया है, जिससे डिजिटल साक्ष्य को संग्रहीत और प्रस्तुत करना सरल हो गया है। ये परिवर्तन ई-कोर्ट्स परियोजना की बुनियाद पर निर्मित हुए हैं, जिसके तहत करीब 18,000 अदालतों का डिजिटलीकरण किया गया है।
सुधारों की दिशा में ठोस प्रगति हुई है, पर कुछ चुनौतियां भी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल बुनियादी ढांचे की कमी और इंटरनेट कनेक्टिविटी की असमानता कई बार बाधा बनती है। फॉरेंसिक प्रयोगशालाएं सीमित हैं और अदालतों तथा पुलिस स्टेशनों में कर्मचारियों की कमी भी एक गंभीर विषय है। एनसीआरबी की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, 2021 से 2022 के बीच साइबर अपराधों में 24.4 फीसदी की वृद्धि हुई है, जो उच्च तकनीकी अपराधों से निपटने के लिए संसाधनों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता को दर्शाता है। बीएनएसएस के अंतर्गत गवाह संरक्षण नियमों को राज्य स्तर पर तैयार किया जाना चाहिए, जिसमें पहचान छिपाने, स्थानांतरण और वीडियो गवाही की सुरक्षित व्यवस्था हो। प्रत्येक जिले में फॉरेंसिक सुविधा के लिए मोबाइल और स्थायी, दोनों प्रकार की प्रयोगशालाएं स्थापित की जानी चाहिए। साथ ही, एक राष्ट्रीय डिजिटल अनुपालन डैशबोर्ड बनाया जा सकता है, जो एफआईआर, जांच की प्रगति व रिमांड की प्रक्रिया पर निगरानी रखे। अंततः विधिक साक्षरता अभियान हो, जो नागरिकों का इसके बारे में जागरूक करे।
भारत के नए आपराधिक कानून एक सकारात्मक और सुविचारित बदलाव का प्रतीक हैं। प्रौद्योगिकी का समावेश, प्रक्रियात्मक सुधार और नागरिक अधिकारों पर केंद्रित दृष्टिकोण इस परिवर्तन को व्यावहारिक बनाते हैं। पहले वर्ष में एक मजबूत आधार स्थापित हो चुका है; अब जरूरत इन्हें और मजबूती से आगे बढ़ाने की है। यदि यह यात्रा प्रशिक्षण, निवेश और नीति समर्थन से सशक्त की जाए, तो भारत की न्याय प्रणाली वास्तव में अधिक तेज, पारदर्शी और नागरिक-अनुकूल बन सकती है।
-साथ में अक्षिता गुप्ता, शोध छात्रा (विधि)।