अवैध प्रवासन की समस्या भारत के लिए नई नहीं है। पूर्वोत्तर राज्यों और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में यह मुद्दा लंबे समय से सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक तनाव का कारण बना हुआ है। कुछ वर्ष पहले के आंकड़ों के अनुसार, भारत में दो करोड़ से अधिक बांग्लादेशी नागरिक अवैध रूप से रह रहे थे। आज यह संख्या बढ़कर कितनी हो गई, इसकी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।
इसके प्रत्यक्ष और परोक्ष परिणाम संसाधनों पर अनावश्यक बोझ, राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरे, स्थानीय जनसांख्यिकीय संतुलन में बदलाव और अपराध में बढ़ोतरी के रूप में दिखते हैं। यह मुद्दा चिंतित करने वाला सिर्फ इसलिए नहीं है, क्योंकि ये अवैध प्रवासी नकली नाम और दस्तावेज हासिल कर पश्चिम बंगाल और असम से दूर दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद तक में अपना ठिकाना बनाते हैं, बल्कि इसलिए भी है, क्योंकि उनको पहचानना और पकड़ना बेहद मुश्किल हो जाता है।
अगर पहचान हो भी गई, तो राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में उन्हें वापस भेजना टेढ़ी खीर साबित होता है। ऐसे में, गृह मंत्रालय के निर्देश पर गुजरात, दिल्ली, हरियाणा, असम, मेघालय और त्रिपुरा जैसे राज्यों में अवैध प्रवासियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने का अभियान जोर-शोर से चल रहा है, जो स्वागतयोग्य है।
इस मामले में गुजरात से दूसरे राज्यों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए, जिसने इस अभियान को सबसे पहले शुरू तो किया ही, अब वह इसमें अग्रणी भूमिका भी निभा रहा है, जिसकी बदौलत वहां अवैध प्रवासी आधे से भी कम रह गए हैं। बांग्लादेशी विदेश मंत्री ने पिछले महीने इस अभियान पर आपत्ति जताई थी, लेकिन इसके बावजूद भारत ने अपने ढंग से यह स्पष्ट संदेश दिया है कि उसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे पहले है। ताजा अभियान की खास बात यह है कि इसमें बायोमेट्रिक्स को भी कैप्चर किया जा रहा है, जिससे अगर अवैध घुसपैठिये दोबारा भारत में प्रवेश करने की कोशिश करें, तो उन्हें रोका जा सके।
हैरानी की बात यह है कि इस अभियान के डर से हजारों प्रवासी स्वेच्छा से भारत-बांग्लादेश सीमा पर पहुंचे हुए हैं। यह दर्शाता है कि सख्त सरकारी नीतियां अवैध प्रवासियों की समस्या से निपटने में कारगर साबित हो सकती हैं, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए सीमा सुरक्षा के तंत्र को और मजबूत किए जाने के साथ बायोमेट्रिक डाटाबेस के विस्तार और कूटनीतिक उपायों पर भी ध्यान देना श्रेयस्कर होगा।