ईरान की संसद में होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाने का एक प्रस्ताव भी पेश किया गया है। दरअसल, ईरान ने होर्मुज को एक प्रभावी हथियार की तरह इस्तेमाल किया है, ताकि बाकी देश अमेरिका पर जंग रोकने का दबाव डालें। होर्मुज की नाकेबंदी के आदेश के जरिये मुमकिन है कि अमेरिका भी ईरान की ही रणनीति पर चलते हुए भारत और चीन समेत उन देशों पर दबाव बनाना चाहता हो, जो होर्मुज पर अति-निर्भर हैं। जाहिर है कि यह स्थिति भारत के लिए चुनौतियां पैदा करेगी, जो कच्चे तेल का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। भारत अपने कुल उपभोग का करीब 90 फीसदी पेट्रोलियम आयात करता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा होर्मुज से ही गुजरता है।
इसके अतिरिक्त, भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक-उपभोक्ता है और दुनिया का एक-तिहाई उर्वरक होर्मुज से होकर ही गुजरता है। हालांकि अमेरिका ने कहा है कि वह होर्मुज से गुजरने वाले गैर-ईरानी बंदरगाहों की ओर से आने-जाने वाले जहाजों को नहीं रोकेगा। बीते कुछ वर्षों में भारत ने अपने ईंधन आयात में विविधता लाई है, फिर भी अगर आपूर्ति मार्ग में कहीं कोई अड़चन आती है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियां बढ़ सकती हैं। महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या यह नाकेबंदी पश्चिम एशियाई संकट को हल करने का माद्दा रखती है। इस तरह के सैन्य-आर्थिक दबाव कई बार उल्टा असर भी डाल सकते हैं। अगर ईरान जवाबी कार्रवाई करता है, तो स्थिति फिर से गंभीर हो सकती है। होर्मुज पर संकट हमंे स्मरण कराता है कि वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था कितनी नाजुक है। नाकेबंदी जैसी कार्रवाइयां थोड़े समय के लिए दबाव बना सकती हैं, पर दीर्घकालिक समाधान नहीं दे सकतीं। संयम और कूटनीति ही पश्चिम एशिया में स्थायी शांति ला सकते हैं।