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तीन पीढ़ियों की कहानी, कर्ज के बोझ से खुदकुशी

देविंदर शर्मा Published by: देविंदर शर्मा Updated Mon, 30 Sep 2019 06:59 AM IST
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किसान - फोटो : a

लवप्रीत सिंह एक युवा किसान था, जिसके कई सपने थे। आठ लाख रुपये का कर्ज विरासत में मिलने के बावजूद वह खेती करना चाहता था। पर कर्ज न चुका पाने के कारण अंततः उसने आत्महत्या कर ली। वह मात्र 22 साल का था। बरनाला जिले के लवप्रीत सिंह की खुदकुशी ने पूरे पंजाब को झकझोर कर रख दिया। तीन पीढ़ियों में उस परिवार ने कृषि संकट के कारण अपने पांच सदस्य खो दिए। डेढ़ साल पहले उसके पिता ने कृषि कर्जमाफी के पहले चरण की घोषणा से ठीक एक दिन पहले आत्महत्या कर ली थी। उससे पहले उसके दादा जी ने भी यही कदम उठाया था। लवप्रीत की मां हरनैल कौर ने मीडिया को बताया, 'हमने सालाना 50,000 रुपये प्रति एकड़ की दर से आठ एकड़ जमीन पट्टे पर ली थी, पर 2017 में ओलावृष्टि के कारण हमारी गेहूं की फसल खराब हो गई। हम उससे कभी उबर नहीं पाए।'



यह संभवतः पहला उदाहरण है, जब किसी किसान परिवार की तीन पीढ़ियों ने लगातार कर्ज का खामियाजा उठाया है। इससे पहले ऐसे मामले सामने आए, जब कोई पिता या मां या उनके बेटे ने खुदकुशी की, पर तथ्य यह है कि आर्थिक संकट एक किसान से लेकर उसकी अगली दो पीढ़ियों तक जारी है, जो स्पष्ट रूप से दिखाता है कि यह बीमारी कितने गहरे तक पैठी हुई है। यह घटना मुझे एक और त्रासदी की याद दिलाती है, जब जसवंत सिंह नाम का एक किसान अपने पांच वर्षीय बेटे को अपनी कमर से बांधकर नहर में कूद गया था। अपने पीछे वह एक चिट्टी छोड़ गया था, जिसमें लिखा था कि वह जानता है कि अपने साथ बेटे की जान लेना अनुचित है, पर उसे पक्का यकीन है कि उसका बेटा उसके दस लाख रुपये का कर्ज नहीं चुका पाएगा।


कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार द्वारा कृषि ऋण माफी के बावजूद आत्महत्याओं का दौर जारी है। अकेले इसी साल जनवरी से जुलाई तक 645 किसानों ने कर्ज के बोझ से दबकर खुदकुशी की। निजी कर्जदाता, बैंक और लघु वित्त संस्थानों के साथ गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के एजेंटों ने किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर किया है। भारतीय किसान यूनियन द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार एक अप्रैल, 2017 से 31 अगस्त, 2019 के बीच कुल 1,280 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की है।


तथ्य यह है कि अनाज की टोकरी कहा जाने वाला पंजाब वर्षों से किसान आत्महत्या के एक प्रमुख केंद्र में बदल गया है, जो चौंकाता है। कांग्रेस सरकार द्वारा ऋण माफी योजना शुरू करने के बाद से किसानों के 4,609 करोड़ रुपये के कर्ज माफ किए गए हैं, जिससे अभी तक 5,61,886  किसान लाभान्वित हुए हैं। भविष्य में बैड लोन की माफी की घटती संभावना के कारण और ज्यादा किसानों के लाभान्वित होने की संभावना नहीं है। पर सच यह भी है कि सरकार सहकारी, राष्ट्रीय, निजी बैंकों सहित निजी महाजनों से लिए बकाए कर्ज माफ करने संबंधी अपने चुनावी वादे से पीछे हट गई है। इस पर 90,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे, पर राज्य सरकार का कहना है कि उसके पास इतने पैसे नहीं हैं।


अगर इस साल अब तक की गई आत्महत्याओं का कोई संकेत है, तो वह यह कि रोज, औसतन तीन किसान आत्महत्या कर रहे हैं। यह त्रासदी उस समय हो रही है, जब पंजाब को वर्ष 2017-18 में चावल उत्पादन में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए कृषि कर्मण पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। वर्ष 2009-10 से केंद्रीय पूल में पंजाब चावल का सर्वाधिक योगदान करने वाला राज्य रहा है, सिर्फ 2010-11 को छोड़कर, जब आंध्र प्रदेश ने पंजाब को पीछे छोड़ दिया था। गेहूं के मामले में पंजाब ने 2008-09 से राष्ट्रीय पूल में सर्वाधिक योगदान करने वाले राज्य के रूप में अपना स्थान कायम रखा है, जो कुल खाद्य भंडार में औसतन 37.83 फीसदी का योगदान करता है। केंद्रीय पूल में गेहूं और चावल के ऐसे उच्च योगदान, और 98 प्रतिशत खेती योग्य भूमि में सुनिश्चित सिंचाई के साथ, फसल की उत्पादकता में वृद्धि और कृषि संकट के बीच का यह विरोधाभास समझ से परे है।


अब जरा कृषि कर्मण पुरस्कार के निर्दिष्ट तीन मानदंडों पर नजर डालें-पहला है उच्च उत्पादन हासिल करना, जिसके लिए 55 अंक रखे गए हैं। दूसरा है, रिकॉर्ड उत्पादन हासिल करने के लिए विशेष पहल, जिसके लिए 30 अंक रखे गए हैं और तीसरा व अंतिम है, खाद्य विकास योजनाओं के तहत खर्च, जिसके लिए 15 अंक हैं। इसी से कृषि में निरंतर संकट के कारण स्पष्ट हो जाते हैं। अगर फसल उगाने वाले किसानों के कल्याण के लिए कम से कम 50 अंक रखकर पैकेज फिर से तैयार किया जाता, तो संकट ग्रस्त कृषक समुदाय को एक सम्मानजनक और स्थायी आजीविका प्रदान करने के लिए नीति नियोजन पर ध्यान केंद्रित किया जाता।


राज्य की नीतियों का जोर अब तक रिकॉर्ड फसल का उत्पादन करने के लिए अंतहीन प्रयास करने वाले किसान की परवाह किए बिना खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने पर रहा है। गेहूं, चावल, मक्का की वैश्विक उत्पादकता में पंजाब शीर्ष पर है, फिर भी कृषि क्षेत्र किसानों के लिए कब्रगाह में तब्दील हो गया है। अब एक दूसरा उदाहरण लीजिए। पराली जलाने के खतरे से निपटने के लिए पंजाब ने 6,400 किसान समूहों का गठन किया है, जो मशीनों के साथ-साथ किसानों को यह शिक्षा भी देते हैं कि फसल तैयार होने के बाद धान की डंठल को क्यों नहीं जलाना चाहिए।
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अत्यधिक सब्सिडी वाली मशीनों को बेचने के लिए 6,400 किसान समूहों का गठन किया गया है। मेरी समझ में नहीं आता कि बढ़ते कृषि संकट से निपटने के लिए इसी तरह का समूह क्यों नहीं बनाया जा सकता? छोटे शिविरों में किसानों के साथ नियमित शिविर और बातचीत का सत्र क्यों नहीं आयोजित किए जा सकते, जिससे उन कारणों का पता चले, जो किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर करते हैं? इन सुझावों को क्यों नहीं शामिल किया जाता है और फिर क्या कार्रवाई की गई, इसकी रिपोर्ट दर्ज की जाती है? बड़ी कृषि मशीनरी बेचते समय जाग जाने वाली सरकार बड़ी मानवीय चुनौतियों के समाधान के मामले में चुप्पी क्यों साधे रहती है?

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