व्यास ने कहा, ‘कीट! तुम भय न करो। मैं तुम्हें वचन देता हूं कि तुम्हें जब तक ब्राह्मण का शरीर प्राप्त नहीं हो जाएगा, तब तक मैं तुम्हें प्रत्येक योनि से शीघ्र छुटकारा दिलाता रहूंगा।' वेदव्यास का आश्वासन सुनकर कीड़ा प्रसन्न हो गया। वह पुनः उसी मार्ग पर लौट आया और बैलगाड़ी के पहिए के नीचे दबकर अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद वह कीड़ा, अनेक निम्न योनियों में पैदा हुआ। हर बार वेदव्यास ने उसे पूर्वजन्म का स्मरण कराया और उन योनियों से मुक्त होने में सहायता भी की। इस तरह वह कीड़ा मरते-मरते साही, गोह, मृग, पक्षी, आदि योनियों में जन्म लेने के उपरांत मनुष्य योनि में निम्न जातियों में पैदा होते हुए क्षत्रिय जाति में भी जन्म लिया। वेदव्यास ने अपने वचनानुसार, हर योनि में उसे दर्शन दिए और उसकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया। आखिरकार, उस कीड़े ने क्षत्रिय कुल में प्राण त्यागकर एक ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया। वह ब्राह्मण जब थोड़ा बड़ा हुआ, तो स्वयं वेदव्यास ने उसे सारस्वत मंत्र सिखाया, जिसके प्रभाव से वह बिना अधिक प्रयास के ही वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता हो गया। कीड़ा अब विद्वान बन चुका था। फिर वेदव्यास ने उसे लोगों को उपदेश देने और उनकी शंकाओं का समाधान करने की आज्ञा दी।
गुरु की आज्ञा से ब्राह्मण ने धर्म का उपदेश देना और शंकाओं का समाधान आरंभ कर दिया। एक बार किसी ने उससे पूछा कि पापी मनुष्य प्राय: सुखी क्यों दिखाई देते हैं? ब्राह्मण ने समझाया, ‘जिन लोगों ने पूर्वजन्म में तामस भाव से दान किया है, उन्हें इस जन्म में उस दान का फल मिलता है, परंतु तामस भाव से कोई सत्कार्य करने पर भी उसे धर्म में अनुराग नहीं होता और इसी कारण पापी व्यक्ति सुखी दिखता है। ऐसा मनुष्य पुण्य-फल को भोगकर भी तामस भाव के कारण नरक में गिरता है।
इस विषय में महर्षि मार्कण्डेय ने कहा है कि मनुष्य की चार श्रेणियां हैं। एक, जिसका पूर्वजन्म का पुण्य शेष है। वह उस पुण्य का सुख पाता है, किंतु नए पुण्य नहीं करता, ऐसे मंदबुद्धि मनुष्य को मिलने वाला सुख केवल इसी लोक तक सीमित रहता है। दूसरा, जिसका पूर्वजन्म का पुण्य तो नहीं है, किंतु वह इस जन्म में नए पुण्य का उपार्जन करता है। ऐसा व्यक्ति परलोक में सुख पाता है। तीसरा, जिसका पूर्वजन्म का पुण्य वर्तमान जन्म में सुख देता है और वह नए पुण्य का उपार्जन भी करता है, जिसके कारण वह इहलोक और परलोक, दोनों जगह सुख पाता है। और चौथा वह है, जिसका पहले का कोई पुण्य शेष नहीं है और वह इस जन्म में भी कोई नूतन पुण्य का उपार्जन नहीं करता, ऐसे मनुष्य को न तो इस लोक में और न ही परलोक में कोई सुख प्राप्त होता है।' इस प्रकार एक कीट से विद्वान ब्राह्मण बने उस व्यक्ति ने धर्म का प्रचार-प्रसार करते हुए बहुत-सा पुण्य अर्जित कर लिया। फिर उसने सूर्य मंत्र का निरंतर जाप किया और बहूदक तीर्थ में अपने शरीर का भी त्याग कर दिया। वेदव्यास के उस शिष्य का लोगों ने बड़े आदर से विधिपूर्वक दाह-संस्कार किया और उसकी अस्थियां उसी तीर्थ-स्थल पर प्रवाहित कर दीं। फिर अगले जन्म में उसी ब्राह्मण ने मैत्रेय नामक प्रख्यात ऋषि के रूप में जन्म लिया। कालांतर में ऋषि मैत्रेय ने वेदव्यास के पिता महर्षि पराशर से शिक्षा प्राप्त की।