मैं ऐसे समाज से आती हूं, जहां आज भी लड़कियों को ज्यादा पढ़ाने-लिखाने के बारे में नहीं सोचा जाता है। मेरा जन्म महाराष्ट्र के अकोला के एक छोटे से गांव रोपरखेड़ा में एक दलित परिवार में हुआ। बचपन से ही मैं खूब पढ़ना चाहती थी। मेरे पिताजी, जो पुलिस कांस्टेबल थे, मुझे पढ़ाना चाहते तो थे, पर जब मैं सातवीं कक्षा में थी, तब मामा के दबाव में आकर उन्होंने मेरी शादी करा दी। उस समय मेरी उम्र बारह साल थी, जबकि मेरे पति की उम्र बाईस साल थी।
मेरे ससुरालवाले मुंबई के पास कल्याण में रहते थे। इस तरह मैं महाराष्ट्र के अकोला जिले से कल्याण आ गई। शादी के बाद मेरी जिंदगी ही बदल गई। मेरे साथ घरेलू उत्पीड़न होने लगा। यहां बात-बात पर मेरे साथ बदसलूकी की जाती। छोटी-मोटी गलतियों पर मारपीट की जाती थी। मैं अपने जीवन के सबसे खराब दौर से गुजर रही थी। शादी के करीब छह माह बाद मेरे पिताजी किसी काम से मुंबई आए थे। उन्हें सामने देखकर मेरे धैर्य की सीमा टूट गई, मैं रोने लगी। पापा मुझे वापस अकोला ले आए, लेकिन यहां आकर परेशानी कम होने के बजाय बढ़ गई। मेरे ही समाज के लोगों ने मेरा बहिष्कार करना शुरू कर दिया। उनके अनुसार मैं एक अमर्यादित पत्नी थी।