उत्तर प्रदेश धीरे-धीरे एक अभूतपूर्व सांप्रदायिक आग में झुलसने की तरफ बढ़ रहा है। राज्य की चारों बड़ी पार्टियां- भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस सीधे-सीधे या परोक्ष रूप से इस त्रासदी की जिम्मेदार हैं। राज्य की जनसंख्या करीब 20 करोड़ है और यह देश की सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य है। ऐसे एक सूबे में सांप्रदायिक उन्माद के सिर उठाने का नतीजा पूरे देश के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। उत्तर प्रदेश में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव का निहितार्थ यह भी है कि इस राज्य का पश्चिमी हिस्सा पहले से ही सांप्रदायिक बारूद की ढेर पर बैठा है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, नई दिल्ली में भाजपा की सरकार बनने के महज दो महीने के अंदर पश्चिम उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव की 259 घटनाएं हुईं, जबकि पूरे राज्य में यह आंकड़ा 600 का है। राज्य का सांप्रदायिक वातावरण दरअसल तभी से बिगड़ रहा है, जब से समाजवादी पार्टी सत्ता में आई है। सपा के इन दो वर्षों के कार्यकाल में राज्य में दंगों की बाढ़-सी आ गई है, जिसमें मुजफ्फरनगर की हिंसा भी शामिल है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शहरों और गांवों में फैली वैमनस्य की इस आग का खतरनाक पहलू यह है कि इसे राज्य के अन्य हिस्सों में फैलने से ज्यादा समय तक नहीं रोका जा सकता। इसका एक कारण अगर भाजपा का हिंदुत्व के एजेंडे पर लौटना है, तो दूसरा कारण अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की सपा की नीति है। रही बात बसपा की, तो वह फिलहाल लाचार दिखती है, जबकि कांग्रेस अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है। सूबे में इससे पहले शायद ही कभी राजनीतिक विवशता सांप्रदायिक सद्भाव बहाल करने में बाधक बनी हो।
बेशक सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर भाजपा अपनी बेगुनाही साबित करने की कोशिश कर रही है, पर राज्य में लगातार प्रतिकूल हो रहे हालात के लिए वह कोई कम जिम्मेदार नहीं। पार्टी के नए अध्यक्ष की छवि ध्रुवीकरण के लिए कुछ भी करने की है। अच्छे दिन और जातिगत राजनीति का मिश्रण तैयार कर बड़ी चालाकी से उन्होंने इसका फायदा लोकसभा चुनाव में उठाया। पर चुनाव के बाद न सिर्फ अच्छे दिनों का नारा खोखला लगने लगा है, बल्कि जातिगत राजनीति के भी कई नुकसान स्पष्टतः देखे जा रहे हैं।
आश्चर्य नहीं कि भाजपा अध्यक्ष आगामी राज्य विधानसभा उपचुनाव की तैयारी के क्रम में, जिसे बाद में होने वाले विधानसभा चुनाव का पूर्वाभ्यास भी माना जा रहा है, अपनी आजमाई गई रणनीति पर ही चलने की सोच रहे हों। इस तथ्य के पीछे ठोस तर्क यह है कि केंद्र में भाजपा के सत्ता में आने के बाद उत्तर प्रदेश में 60 फीसदी सांप्रदायिक घटनाएं उन विधानसभा क्षेत्रों में हुईं, जहां आने वाले दिनों में उपचुनाव होने वाले हैं।
दुखद यह है कि समाजवादी पार्टी भी अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की वकालत कर कमोबेश उसी कदम पर चलती दिख रही है, जिस रास्ते पर भाजपा चल रही है। सपा उन अल्पसंख्यक कट्टरपंथियों को बचाने का कोई अवसर नहीं चूकती, जो कई तरह की समस्याओं में घिरे अल्पसंख्यक समुदाय के बीच कट्टर सोच के बीज बोते हैं। सत्ता में होने के कारण राज्य में कानून-व्यवस्था बिगड़ने की जिम्मेदार भी तो आखिर वही है।
ऐसे में मायावती और बसपा के लिए यह सुनहरा मौका होना चाहिए कि वह राज्य में भाजपा और सपा द्वारा खेली जा रही सांप्रदायिक राजनीति में अपनी दखलंदाजी दे। लेकिन लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाने का अपमान झेल रही बहनजी अपने गढ़ में बढ़ रहे इस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से कैसे निपटे, इसे लेकर उलझन में हैं। चुनाव से पहले दलित-मुस्लिम गठबंधन बनाने की उनकी कोशिश यही बताती है कि वह अत्यंत रक्षात्मक मुद्रा में हैं। इसकी वजह यह है कि उनके संसदीय क्षेत्र में दलितों और मुसलमानों के बीच दूरियां बढ़ी हैं और हाल के महीनों में भाजपा ने वहां अपनी पहुंच बढ़ाई है। यह मात्र संयोग नहीं है कि हाल में हुई सांप्रदायिक हिंसा की कई घटनाएं दलितों और मुसलमानों के बीच हुई हैं। मायावती और उनकी पार्टी ने शायद इसलिए सुनियोजित चुप्पी ओढ़ रखी है कि सांप्रदायिक हिंसा के मामलों में भाजपा और सपा के बीच चल रहे विवाद का आगामी विधानसभा चुनाव में उसे लाभ मिलेगा। उनकी यह रणनीति बेशक सही हो सकती है, पर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।
रही बात कांग्रेस की, तो लोकसभा चुनाव में अपनी पराजय के बाद देश की यह सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी उत्तर प्रदेश में अपना महत्व लगभग खो चुकी है। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी की विफलता और कांग्रेस की शर्मनाक पराजय के बाद से पार्टी लगभग हाशिये पर है। लोकसभा चुनाव में हार के बाद अब तो संसद में भी कांग्रेस की आवाज मंद पड़ गई है।
सांप्रदायिक वैमनस्य की आग में झुलसते उत्तर प्रदेश से आंख मूंदकर केंद्र की एनडीए सरकार गलती ही करेगी। उत्तर प्रदेश की किसी और राज्य से तुलना नहीं की जा सकती, न ही कहीं का मॉडल यहां लागू किया जा सकता है। यह देश की सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य है, जहां चार करोड़ मुसलमान रहते हैं। इसलिए यहां सांप्रदायिक सद्भाव बहाल करने की बड़ी जरूरत है। अगर उत्तर प्रदेश की स्थिति इसी तरह बिगड़ती रही, तो यह प्रधानमंत्री के विकास संबंधी दावों की हवा निकाल सकती है। लिहाजा अल्पकालिक राजनीतिक लाभ छोड़ राष्ट्र के दीर्घकालिक हितों को पूरा करने के लिए सांप्रदायिक वैमनस्य को खत्म करना बहुत जरूरी है।
(वरिष्ठ पत्रकार, और बहनजी-ए पॉलिटिकल बायोग्राफी ऑफ मायावती के लेखक)