कश्मीर की जिहादी लड़ाई अब दिल्ली मीडिया का एक हिस्सा लड़ रहा है, जिसने युक्तिपूर्वक अट्ठारह जवानों या नागरिकों को बचाने वाले मेजर गोगोई के खिलाफ उस पत्थरबाज डार को खड़ा कर दिया है, जिसे जीप के आगे बांधा गया था।
जो सैनिक संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए शासकीय कर्तव्य का पालन कर रहा था, उसे झूठा और दुष्ट सिद्ध करने में कुछ ऐसे लेखक-पत्रकार जुट गए हैं, जिनकी हमदर्दी पत्थरबाजों तथा अलगाववादियों के साथ रही है। क्या उन्होंने पत्थर फेंकने वालों से कोई सवाल कभी किया है?
मेजर गोगोई एक बहादुर फौजी अफसर हैं। वह अनुशासित और संवेदनशील हैं। उनका बयान है कि फारूक डार लोगों को सैनिकों के खिलाफ भड़का रहा था-वह शॉल नहीं बुन रहा था। बडगाम में जहां मतदान हो रहा था, वह फारूक अहमद डार के घर से 20 किलोमीटर दूर है। कोई पूछ नहीं रहा कि जहां उसे मत नहीं देना था, वहां वह क्या करने गया था? कोई नहीं बता रहा कि चारों ओर से खून की प्यासी खूंखार भीड़ से घिरे सैनिक उस स्थिति में क्या करते? पत्थरबाजों के सामने गिड़गिड़ाते? डर के मारे हथियार छोड़कर भाग आते और फिर यही पत्रकार उनके मोबाइल पर खींचे वीडियो वायरल करते? या फिर अंतिम उपाय के रूप में उत्तेजित भीड़ पर गोलियां चलाते? फिर क्या होता? यही कि सेना ने कश्मीरियों पर गोली चलाकर इतने लोगों को मार डाला। मेजर गोगोई ने तुरंत विवेक का सहारा लेकर उन्हीं पत्थरबाजों में से एक को पकड़कर जीप पर बंधा और जवानों तथा नागरिकों की जान बचाई। क्या यही मेजर गोगोई का जुर्म माना जाएगा?
कुपवाड़ा, शोपियां, भद्रवाह, हंदवाड़ा में हर दिन जवान शहीद हो रहे हैं। पाकिस्तान के बर्बर हमलों ने हमारे जवानों के सिर काट लिए हैं। लेकिन जो पत्रकार और जेएनयू छाप वामपंथी छात्र फारूक अहमद डार को सेना की बर्बरता का प्रतीक बनाकर प्रचारित कर रहे हैं, वे पाकिस्तानी तथा इस्लामी जिहादी बर्बरता एवं अमानुषिकता पर एक शब्द भी नहीं बोलते। उनके द्वारा उस मानसिकता का कभी विश्लेषण नहीं किया जाता, जो एक जिहादी को बर्बर और मनुष्यता-विरोधी बनाती है।
श्रीनगर की बाढ़ में किसने मदद की?कश्मीर में सेना के 40 से ज्यादा प्रथम श्रेणी के सद्भावना विद्यालय चल रहे हैं, जहां 14 हजार से ज्यादा कश्मीरी, प्रायः शत-प्रतिशत मुस्लिम बच्चे-बच्चियां पढ़ रहे हैं। इनमें से दस विद्यालयों में मैं स्वयं गया हूं। शोपियां जैसे आतंकवाद प्रभावित क्षेत्र में भी सद्भावना विद्यालय हैं। इन विद्यालयों का स्तर इतना श्रेष्ठ है कि वहां के नेता अपने बच्चों का दाखिला कराने के लिए सिफारिशें करते हैं। कश्मीर में सेना के अस्पताल, डॉक्टर ग्रामीण कश्मीरियों की निःशुल्क चिकित्सा करते हैं। सेना-पुलिस की भर्ती होती है, तो सौ स्थानों के लिए पचास-साठ हजार आवेदन आते हैं।
कश्मीर का अधिकांश युवा, सामान्य नागरिक सुख-चैन से जीना चाहता है। लेकिन पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी मीडिया के एक वर्ग की मदद से कश्मीर को आतंकवादी और सेना द्वारा प्रताड़ित बता रहे हैं। सेना झूठी और पत्थरबाज सच्चा-यह दुर्भाग्यजनक वातावरण बनाना न तो भारत के हित में है और न ही सेना का मनोबल बढ़ाने वाला। इससे अलगाववादियों का ही हौसला बढ़ेगा।
लेखक पूर्व भाजपा सांसद हैं