एक बार एक जगह तीन पत्थर इकट्ठे होकर अपने दुख-सुख बांटने लगे। पहले पत्थर ने अपने भाग्य की सराहना करते हुए कहा, `मैं तो एक खेत में, मिट्टी की गोद में गुमनाम जीवन गुजार रहा था। मेरी खुशकिस्मती कि मुझे धन्ना जाट जैसा भक्त मिल गया और मैं गुमनाम से भगवान बन गया। ठाकुर के रूप में सब जगह मेरी पूजा की जाती है। धन्ने जैसा विश्वास आदमी को हर सफलता के द्वार पर ले जाता है। यह मेरी सीख है, वर्ना मैं क्या हूं? पत्थर निरा पत्थर। खैर तुम सुनाओ, तुम्हारी कैसी गुजर रही है?’
`भैया, मैं भी तुम्हारी तरह किसी चट्टान तले दबा, अंधेरे की परतों में दिन गुजार रहा था कि शिल्पी ने मुझे ढूंढ़ निकाला। तराशा, संवारा और प्रेम के अमर प्रतीक ताजमहल में सजा दिया। तब से मैं दुनिया को प्रेम का पाठ पढ़ा रहा हूं। जब-जब प्रेमी युवा जोड़े एक दूसरे के लिए मर मिटने की कसमें खाते हैं तब तब मैं अपने भाग्य पर इठलाता हूं। भैया, मैं बोले जा रहा हूं, तुम चुप और उदास हो, क्या बात है?’ दूसरे पत्थर ने तीसरे पत्थर से कहा जो कहीं दूर खोया हुआ लगता था।
`भाइयो, मैं एक बदनसीब पत्थर हूं। हालांकि मेरी कहानी तुमसे एकदम उलट है। देखने में एक दूधिया, संगमरमरी चौकोर टुकड़ा हूं और बेहद कीमती हूं। यही क्यों जिस दिन तालियों की गड़गड़ाहट के बीच मेरे ऊपर से रेशमी परदा हटाया गया था, उस दिन लोग मेरी एक झलक पाने के लिए बेकाबू हो उठे थे और पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा था। नेताजी ने अपने कर कमलों से किसी नयी योजना का शिलान्यास जो किया था। बाद में अपने वादे का सारा दायित्व मुझ पत्थर पर डाल कर वे सब भूल गए। बस, नेताजी के किए की सजा मुझे मिल रही है। लोग जब मेरे ऊपर थू-थू करते हैं तब जैसे मैं यही सीख लेता हूं कि चाहे कोई और मुझे छू ले पर मुझे नेताजी न छुएं। नेताजी के छूने से मैं लोगों की नज़रों में अपवित्र हो गया हूं। ठोकरें ही ठोकरें मिल रही हैं। कहां जाऊं? अपने नेताजी से पूछो कि अब शिलान्यास कहां होगा।’ यह कह कर दोनों पत्थर खिलखिलाने लगे।