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शिक्षा से ज्यादा जरूरी है जिंदा रहना

Thu, 04 Aug 2016 07:53 PM IST
अवनींद्र सिंह जादौन
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अवनींद्र सिंह जादौन
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ग्रामीण परिवेश के बच्चों को शिक्षा देना जितना सरल प्रतीत होता है, व्यावहारिक रूप से उतना ही दुष्कर कार्य है। आंकड़े बताते हैं कि सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में छात्रों का नामांकन घट रहा है और बेसिक शिक्षा विभाग लाख कोशिश के बाबजूद नामांकन बढ़ाने में विफल रहा है। पर सबसे बड़ी समस्या है नामांकित बच्चों को स्कूल में रोके रखना।
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ग्रामीण जीवन आसान नहीं होता। वर्तमान में वही परिवार गांव में रहने को मजबूर हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है। ज्यादातर ग्रामीणों का सपना आर्थिक मजबूती हासिल कर शहरों में बसना होता है। ग्रामीण परिवारों में भी दो वर्ग हैं। एक वह है, जिसके पास पैतृक जमीन है, जबकि दूसरा वर्ग भूमिहीन मजदूरों का है। जमीन वाले किसानों की गिनती समृद्ध लोगों में होती है। ऐसे समृद्ध लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाना तौहीन समझते हैं, इसलिए इनके बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं, जबकि मजदूरों के बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण सरकारी स्कूलों में पढ़ने को विवश हैं।

गांवों में रहने वाले ज्यादातर परिवारों में बच्चों की संख्या अधिक होती है, जिनके पालन-पोषण के लिए माता-पिता के साथ किशोर बच्चों को भी काम पर लगना पड़ता है। ज्यादातर परिवार में सभी सदस्य मजदूरी कर भी वर्ष भर के गुजारे लायक नहीं कमा पाते। पूरे परिवार के मजदूरी करने के कारण शेष बच्चों को अपने से छोटे बच्चों की देखभाल के लिए घर पर रुकना पड़ता है। उन बच्चों को स्कूल लाना एक चुनौती भरा काम है।
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फसल बोने और काटने का समय प्राइमरी स्कूलों के लिए मुश्किल भरा समय होता है। इस दौरान खेतों पर काम करने वाले बच्चों को एक दिन मजदूरी के 150 से 200 रुपये मिल जाते हैं। पूरा परिवार दो महीने में लगभग 50,000 रुपये तक कमा लेता है। गरीब परिवार के लिए यह पूरे वर्ष के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त कमाई है। ऐसे में अपने बच्चों से काम करवाना इनकी मजबूरी है। दो महीने स्कूल से गायब रहने बाले इन बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल करना अध्यापकों के लिए एक कठिन चुनौती है।

ज्यादातर छात्राएं अपने घरों पर भोजन बनाकर स्कूल जाती हैं, क्योंकि उनके माता-पिता खेतों पर जा चुके होते हैं, जबकि लड़के पालतू जानवरों के साथ पिता की सहायता करते हैं। जहां शहर में अभिभावक सुबह अपने बच्चों को टाई-बेल्ट पहनाकर, टिफिन तैयार कर बस के इंतजार में खड़े होते हैं, वहीं ग्रामीण अभिभावक तब तक रोजी-रोटी के लिए निकल चुके होते हैं। शहर में बच्चों की क्षमताओं को विकसित करने के लिए ट्यूशन और कोचिंग की चिंता की जाती है, जबकि गांव में बच्चे को पैतृक धंधे से जोड़ने की शुरुआत उसके बचपन में ही हो जाती है। शहर में जहां कक्षा 10 की छात्रा एक कप चाय बनाना भी नहीं चाहती, वहीं गांव में कक्षा आठ की छात्रा गृहकार्यों में निपुण हो चुकी होती है।

ऐसे में, दोनों क्षेत्रों के बच्चों की तुलना करना न्यायसंगत नहीं दिखता। हालांकि सर्वशिक्षा अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने सभी बच्चों को स्कूल की दहलीज पार करवा दी है, लेकिन विषम पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों में ग्रामीण छात्रों को स्कूलों में टिकाए रखना आसान नहीं है, क्योंकि शिक्षा से ज्यादा जरूरी है जिंदा रहना।
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