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निजी मेडिकल कॉलेजों का हाल

सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 05 Jul 2018 06:25 PM IST
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सुभाषिनी सहगल अली

कुछ दिन पहले ट्रेन में एक सज्जन से भेंट हुई, जो एक बहुत ही प्रतिष्ठित धर्मार्थ अस्पताल चलाने वाले ट्रस्ट के मुखिया हैं। वह डॉक्टरों के बदले हुए दृष्टिकोण के बारे में बता रहे थे। उन्होंने कहा कि निजी मेडिकल कॉलेजों से निकले डॉक्टर पैसे कमाने में सरकारी कॉलेजों से निकले डॉक्टरों से अधिक रुचि रखते हैं। उनकी बातों ने मुझे उस महिला की याद दिलाई, जिसने कुछ दिन पहले इंदौर के एक निजी मेडिकल कॉलेज में आत्महत्या की थी। स्मृति लहरपुरे की मौत 11 जून को हुई और उसे ‘प्रेम प्रसंग’ से जोड़ा गया। फिर उसका सूइसाइड नोट मिल गया, जिसमें लिखा था, 'मेरी मौत के लिए सीधे तौर पर कॉलेज के चेयरमैन और प्रबंधन जिम्मेदार है।'



स्मृति को पहले बताया गया था कि एक साल की फीस 8.55 लाख और होस्टल फीस दो लाख है। पर फिर तमाम छात्रों से कई लाख रुपये अधिक ऐंठे गए, जिसके विरुद्ध वह अदालत गई। अदालत ने उनका पक्ष लिया, इसके बावजूद कॉलेज उन सबसे बढ़ी हुई फीस लेता रहा। इसके अतिरिक्त उसने कभी स्मृति को उसका वजीफा नहीं दिया, उल्टे उस पर दंड लगाते गए। इसके बाद चैयरमैन ने प्रबंधन को उन सभी छात्रों से बकाया फीस वसूलने का आदेश दिया, जिन्होंने अदालत के निर्देशानुसार फीस जमा की थी। स्मृति ने लिखा है, 'किसी भी हालत में मैं बढ़ी हुई फीस जमा नहीं कर सकती थी। मेरे माता-पिता पहले से ही बढ़ी हुई फीस के लिए रिश्तेदारों और दोस्तों से रुपये उधार ले चुके थे। मैंने ऐसा फर्जी संस्थान पहले कभी नहीं देखा। यहां कोई ढांचा और व्यवस्था डॉक्टरों और मरीजों के परिजनों के लिए नहीं है। इन्होंने रिश्वत और धमकी देकर एमसीआई की मान्यता हासिल की है। ये लोग सिर्फ पीजी स्टूडेंट को प्रताड़ित करने में लगे हैं, जो असहनीय है। मैं इतनी प्रताड़ना और लूट सहते हुए इतने दबाव में काम और पढ़ाई नहीं कर सकती। इसलिए मैंने इससे मुक्त होने का निर्णय लिया है। प्लीज, इस कॉलेज को बंद करो, जहां मरीजों की जिंदगी और कॉलेज स्टूडेंट के करियर का विनाश किया जाता हो।'


भावुक होने के बजाय स्मृति की बातों का मतलब समझने की कोशिश करने की जरूरत है। वह कह रही है कि इस तरह के निजी कालेजों में लूट तो होती ही है, छात्रों की पढ़ाई भी सही तरीके से नहीं होती। आज हमारे देश में निजी मेडिकल कॉलेज अधिक हैं, सरकारी कम। इन निजी कॉलेजों में कुछ अपवाद हैं, जहां बढ़िया पढ़ाई होती है, और जहां के अस्पतालों में बड़ी संख्या में मरीज होते हैं-जो छात्रों को व्यावहारिक तर्जुबा देने के लिए आवश्यक है-और मरीजों का इलाज भी ईमानदारी से होता है। पर सरकारी रिपोर्ट बताती है कि ज्यादातर निजी मेडिकल कॉलेजों में ढंग से पढ़ाई नहीं होती और बाकी ढांचा भी नहीं होता। कई कॉलेजों में आसपास के गरीब लोगों को बुलाकर बिस्तर पर लिटा दिया जाता है और डॉक्टरों के एक दिन के लिए वहां उपस्थित होने के लिए मोटी रकम दी जाती है। यह तब किया जाता है, जब मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा निरीक्षण किया जाना होता है। उसके बाद मरीज भगा दिए जाते हैं और डॉक्टर भी नदारद हो जाते हैं।


लोगों का इलाज करने के लिए इस तरह डॉक्टर तैयार किए जा रहे हैं। हममें से बहुत लोग ऐसे हैं, जिन्हें आरक्षण के माध्यम से डॉक्टर बनने वालों पर बहुत एतराज होता है। लेकिन निजी कॉलेजों में पैसे भरकर लोग डॉक्टर बनते हैं। उनकी पढाई और उनका प्रशिक्षण भी नहीं होता। पर हम कभी यह नहीं कहते कि इनसे समाज को कितना खतरा पैदा हो रहा है। हम खामोश रहते हैं, जैसे स्मृति की आत्महत्या पर भी हम खामोश हैं।


-माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य।

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