साधो, वसंत आना चाहता है, लेकिन ठंड निगोड़ी फिलहाल उसे बाहर धकेलने में लगी हुई है। एक वसंत और हजार दुश्मन। मैं पिछले कई दिनों से वसंत को ढूंढने में लगा हुआ हूं। उस दिन डासना जेल के बाहर वह खूब हनक में था। डेढ़ सौ कारों का काफिला उसके स्वागत में था। यह वसंत का नया चेहरा है। खिला-खिला। हंसता-विहंसता, फूल-मालाओं से लदा हुआ।
वसंत अब राजनीतिक हो चला है। पहले वह पेड़ की फुनगियों पर और लोगों के दिलों में उतरता था। तब बूढ़े शजर भी वसंत में कल्लियाने लगते थे। इन दिनों वसंत बगियाओं को छुए बिना ही लौट जाता है। उसका रुख अब बाजार की तरफ है। पिछले दिनों वह ऑटो एक्सपो में एक करोड़ की बॉस हॉस बाइक देखने में मस्त था। मैंने तब उसे पूछा था, यहां क्यों आए हो? उसका कहना था, मैं पुराना वाला वसंत नहीं हूं। अब तो जहां पूंजी, वहां वसंत। पुराने कवियों की तरह मुझे सरसों के फूलों और आम की मंजरियों में तलाशोगे, तो कुढ़ते रहोगे। मैंने अब 'भाई साहब’ और ’पंडित जी’ के पास रहने की जगहें जुगाड़ ली हैं।
यह सुनकर मैं वसंत की बेशर्मी से बेहद आहत हो गया। पुराने साथीपन की याद दिलाने पर वह बोला, पुरातन वसंत को याद करना सिर्फ नॉस्टेल्जिया है, और कुछ नहीं। वसंत यानी नए जमाने का वैलेंटाइन, जहां गिफ्ट के बिना प्यार नहीं पनपता। वैसे भी इश्क लेन-देन का व्यापार है। जब शुद्ध देसी घी, विशुद्ध पानी और खालिस हवा नहीं, तो असली प्यार की तलाश में भटकना निरी मूर्खता है।
जब सब कुछ बदल चुका है, तब प्यार ही वही क्यों बना रहे, जो पहले रहता आया था। पुराने शायर इसी प्यार में डूबने-मरने की बेवकूफी करते रहे। हीर-रांझा और शीरीं-फरहाद के रहने की जगहें अब पागलखाना हैं। लैला के प्यार में बदनसीब मजनूं कितनी जल्दी जमींदोज हो गया। उसने जिंदगी के कितने कम वसंत देखे। सच कहूं, तो उस ईमानदार और खुद्दार शख्स के पास वसंत कभी आया ही नहीं। इन दिनों वसंत सिर्फ उन्हीं से मुखातिब होता है, जहां पहले से ही कई वसंत बैठे हुए हैं।