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विलासिता पर खर्च: शादियों की चकाचौंध और बेशुमार दौलत से कोई अछूता नहीं, क्या सादगी के लिए कोई गुंजाइश है?

मनोज मिश्र
Updated Wed, 17 Jul 2024 03:28 AM IST

सार

लकदक शादियों को हसरत भरी निगाहों से देखने वाले आम लोगों को शायद इस बात का एहसास भी नहीं है कि सारे खाली खजाने आखिर में उन्हें और उनकी आने वाली पीढ़ियों को अपने ही खून-पसीने की कमाई से भरने हैं।
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शादियों में खर्च (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : एएनआई


अब किसी को इस बात की परवाह नहीं होती कि अब भी इस देश के बड़े हिस्से में लड़की का बाप सबसे निरीह प्राणी कहा जाता है। बड़ी मिसालें हैं कि बेटी के लिए दहेज जुटाने में कई लोगों की जिंदगी भर की पूंजी खर्च हो जाती है, फिर भी ससुराल वाले संतुष्ट नहीं होते। इस बात का खतरा बना रहता है कि न जाने कब लाडली की मासूम मुस्कराहटें ससुराल पक्ष की टीवी, फ्रिज और कार जैसे ठंडे लोहे की लालसाओं की भेंट चढ़ जाएं। अब इस बात को लेकर कहीं कोई फिक्र नहीं दिखती कि लकदक शादियों को फटी आंखों से देखने के बाद दूल्हों के कस्बाई मां-बापों की हसरतें किस कदर आसमान छू रही होंगी। ब्याह में ऐसी न सही, इसके आस-पास की शान-शौकत के निष्ठुर सपने उनकी आंखों में भी कुलबुलाने लगे होंगे। महंगी सजावट, डिजाइनर कपड़े, भारी-भरकम गहने-जेवर और छप्पन प्रकार के व्यंजन, सब वैसा चाहिए होगा, जिसकी चकाचौंध से फिल्मी सितारों, खिलाड़ियों व धर्मगुरुओं से लेकर राजनेताओं तक, सब सम्मोहित हैं।


सामाजिक सरोकारों से कटे हुए, एकांगी और आत्ममुग्ध समाज इसी तरह व्यवहार करते हैं। वहां सादगी  के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती है। आजकल किसी से इस बात की अपेक्षा रखना कि वह अपने मोहल्ले के प्राथमिक शिक्षक का सम्मान करेगा, किसी कारीगर को उसकी उजरत का पैसा चुकाते हुए विनम्र बना रहेगा या अपेक्षाकृत कमजोर आर्थिक स्थिति वाले अपने संबंधियों को भी घरेलू फोटो फ्रेम में हिस्सा देगा, बेमानी है। जब समाज के भीतर खुद मूल्यों को लेकर कोई आग्रह न हो, तो फिर जिनकी जेब में पैसा है, उनसे किसी नैतिकता और मर्यादा की अपेक्षा क्यों रखी जानी चाहिए? इस पूरे विमर्श का एक सिरा समाज में मूल्यों के ह्रास से जुड़ता है, तो दूसरा क्रोनी कैपिटलिज्म से। कहने की जरूरत नहीं कि हाल के वर्षों में एकाएक बने कई अमीरों की दौलत में पीढ़ी-दर-पीढ़ी व्यापार के विस्तार की कमाई के बजाय नए तरीकों और तंत्र के चोर दरवाजे से घुसकर जुटाई गई समृद्धि का हिस्सा है। इसलिए भी अब समाज को लेकर नैतिक दायित्वों का कोई दबाव नहीं दिखता।


दुनिया में ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जहां उद्योगपतियों ने फाउंडेशन बनाए, चैरिटेबल ट्रस्ट खोले या फिर इसी तरह का कोई और उपक्रम करते हुए अपनी दौलत का एक हिस्सा उस समाज को लौटाया, जिससे उन्होंने इसे हासिल किया था। बेशक इस प्रक्रिया में भी तमाम झोल हैं। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जहां दान के बजाय दिखावा ज्यादा है या फिर दान के नाम पर संपत्ति को उलटफेर कर अपने ही खाते में जोड़ लेने की शातिर कवायद। इस कड़वे सच के बावजूद इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि उद्योगपतियों के ट्रस्टों और फाउंडेशनों ने तमाम जरूरतमंदों के जीवन में बदलाव लाने में अहम भूमिका निभाई है।


मगर इन मिसालों से इतर ब्याह के नाम पर लगातार बढ़ रहे तमाशे, किराये के मेहमान, फिल्मी गानों पर ठुमके और पति-पत्नी के प्रेम के प्रदर्शन के नाम पर हिंदी-अंग्रेजी फिल्मों से चुराए सस्ते संवाद बढ़ते जा रहे हैं। अधनंगी मॉडलों के वार्षिक कलेंडर से लेकर महंगी पार्टियों तक, हवाई जहाज से लेकर यॉट की खरीद तक वैभव का प्रदर्शन करने वाले लोगों की एक शृंखला मिलेगी, जो  बैंकों को दिवालियापन सौगात में देते हैं।


लकदक शादियों को हसरत भरी निगाहों से देखने वाले आम लोगों को शायद इस बात का एहसास भी नहीं है कि सारे खाली खजाने आखिर में उन्हें और उनकी आने वाली पीढ़ियों को अपने ही खून-पसीने की कमाई से भरने हैं।

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