भारत जैसे लोकतांत्रिक देश की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां किसी भी चीज पर बहस हो सकती है। अब जैसे हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी उर्फ मनोज कुमार को भारतीय सिनेमा का सर्वश्रेष्ठ सम्मान, दादासाहेब फाल्के, दिए जाने ही पर कुछेक प्रतिक्रिया यह आई है कि असहिष्णुता और देशद्रोह की कर्कशता के बीच केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने एक सच्चे 'देशभक्त' को यह पुरस्कार दिया है। इसमें शक नहीं कि मनोज कुमार ने रुपहले पर्दे पर देशभक्ति की परिभाषा दी है।
पिछले कुछ दशकों में भारत की जो एक मजबूत पहचान बनी है, उससे बहुत पहले उन्होंने भारत को एक ब्रांड बनाया था, भले ही वह सेल्यूलाइड के पर्दे पर क्यों न हो। लेकिन यह कहना बहुत उचित नहीं कि इस वक्त मनोज कुमार को यह पुरस्कार देना देशभक्ति को सर्टिफिकेट देने जैसा है। मनोज कुमार के समूचे फिल्म करियर को, जिसमें अभिनय के अलावा उनके लेखन और निर्देशन को भी शामिल करना होगा, क्या किसी सरकारी सर्टिफिकेट की जरूरत है? सब कुछ छोड़ दें, तो 'शहीद' फिल्म में भगत सिंह का किरदार ही उन्हें अविस्मरणीय बनाता है। फिर जिस भारतीय प्रधानमंत्री का सबसे कम मूल्यांकन हुआ है, उन लालबहादुर शास्त्री के 'जय जवान-जय किसान' नारे को उपकार जैसी एक फिल्म के जरिये सामने लाकर मनोज कुमार ने जवानों और किसानों के महत्व को कदाचित सबसे प्रभावी रूप से दर्शाया था।
इस तथ्य की भी अनदेखी नहीं कर सकते कि मनोज कुमार को अचानक इस पुरस्कार के लिए नहीं चुना गया। पिछले कम से कम दो वर्षों से दादासाहेब फाल्के पुरस्कार के रूप में जीतेंद्र और मनोज कुमार को दावेदारों के तौर पर देखा जा रहा था। उस वक्त देशभक्ति की यह बहस कहीं थी ही नहीं।
हिंदी सिनेमा की पड़ताल करने पर पाएंगे कि अनेक अभिनेताओं ने पर्दे पर दिलीप कुमार का अभिनय देखकर अभिनेता बनने की सोची। इसमें कुछ गलत नहीं है। न ही इससे उन अभिनेताओं की क्षमता पर सवाल उठाए जा सकते हैं। आखिर किशोर कुमार और मुकेश जैसे पार्श्व गायक भी शुरुआत में के एल सहगल की कॉपी ही करते थे। अभिनय के क्षेत्र में इसी तरह राजेंद्र कुमार से लेकर मनोज कुमार और धर्मेंद्र तक दिलीप कुमार के प्रभाव दिख जाएंगे। जिन अमिताभ बच्चन को हिंदी सिनेमा के सबसे क्षमतावान अभिनेताओं में गिना जाता है, उनमें दिलीप कुमार का कमोबेश प्रभाव न हो, ऐसा कैसे हो सकता है! मनोज कुमार ने तो अपना फिल्मी नाम भी दिलीप कुमार की फिल्म के एक किरदार के नाम पर रखा था! इसके बावजूद अनेक चॉकलेटी नायक पर्दे पर हंसने-रोने के बावजूद दिलीप कुमार नहीं बन पाए।
मनोज कुमार की खासियत यह है कि उन्होंने एक देशभक्त की छवि पेश की, जो अस्सी के दशक में बनी क्रांति तक जाती है। इस इमेज को छोड़ दें, तो उन्होंने ढर्रे की अनेक फिल्मों में भी काम किया, जिसने उनकी कोई बहुत सार्थक छवि निर्मित नहीं की। दिलीप कुमार, शिवाजी गणेशन, सौमित्र चटर्जी और प्राण जैसों में अभिनय का जो विराट रेंज है, मनोज कुमार में वह उतना नहीं है, लेकिन हिंदी सिनेमा के एक संवेदनशील व्यक्तित्व के तौर पर उन्होंने अपनी जो छवि बनाई, उससे इनकार नहीं किया जा सकता।
अलबत्ता मनोज कुमार को मिले इस शीर्ष सम्मान के संदर्भ में कुछ दूसरे मुद्दों पर तो विचार किया ही जा सकता है। जैसे-दादासाहेब फाल्के सम्मान वैसे तो संपूर्ण भारतीय सिनेमा में युगांतरकारी योगदान के लिए है, लेकिन गहराई में देखें, तो हिंदी सिनेमा से जुड़े लोगों को सर्वाधिक बार यह पुरस्कार मिला है। इस आधार पर यह नहीं मान सकते कि सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं हिंदी सिनेमा में ही हैं। फिर हिंदी में भी सबके साथ न्याय हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। बलराज साहनी और संजीव कुमार जैसे अभिनेता इस पुरस्कार के लायक नहीं थे, यह मानना मुश्किल है। इसी तरह जो पुरस्कार मजरूह सुल्तानपुरी को मिला, वह साहिर लुधियानवी को भी मिलना चाहिए था। नौशाद निर्विवाद रूप से हिंदी फिल्म संगीतकारों में श्रेष्ठतम थे, पर सचिन देब वर्मन को भी यह सम्मान मिलता, तो अच्छा होता। हिंदी से इतर ममूटी और कमल हासन जैसों की उपेक्षा क्यों?
जो पुरस्कार सत्यजित राय, लता मंगेशकर, अडूर गोपालकृष्णन, श्याम बेनेगल और वी के मूर्ति को मिला है, उसकी गरिमा को बनाए रखना ही सबके हित में होगा।