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हिंदी: आगे पुलिया संकीर्ण है

Mon, 14 Sep 2015 08:39 AM IST
विनोद वर्मा/संपादक, अमर उजाला डॉट कॉम
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दिवंगत पत्रकार प्रभाष जोशी ने हिंदी की दुर्दशा पर इसी शीर्षक से एक लेख लिखा था। वे हिंदी के प्रति सरकारी रवैये पर चर्चा कर रहे थे। लेकिन इस समय हिंदी की चर्चा सरकारी रवैये से इतर भी करने की आवश्यकता है। खासकर तब जब हिंदी रुदालियों का वार्षिक आयोजन चल रहा है।
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हिंदी की दशा जानने के बहुत से पैमाने हो सकते हैं। शुरुआत अगर साहित्य और प्रकाशनों से कर सकते हैं। भारत में ही अमीष त्रिपाठी और चेतन भगत की अंग्रेजी में लिखी किताबों की लाखों प्रतियां बिक जाती हैं। लेकिन हिंदी के सबसे बड़े लेखक की भी नई किताब कुछ हजार ही प्रकाशित होती हैं। बिकती कितनी हैं यह अलग बहस है। जिस भाषा को बोलने, समझने वालों की संख्या 50 करोड़ पहुंच रही हो, उस भाषा की किताबों का यह हश्र दुर्भाग्य से अभी भी हमारी चिंताओं में शामिल नहीं है।

प्रकाशकों का षडयंत्र इतना बड़ा है कि किताबें दुकानों में कम सरकारी खरीद के जरिए लाइब्रेरियों में धूल फांकने के लिए ज्यादा पहुंच जाती हैं। प्रकाशनों की बात करें तो समाचार पत्रों की स्थिति भी दोयम दर्जे की है। चाहे वो अंग्रेजी के अखबारों से कितने ही ज्यादा बिकते हों लेकिन उनका रसूख अभी भी अंग्रेजी से कमतर ही है।
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अभी भी माना जाता है कि सरकारी और गैर सरकारी सभी जगह निर्णय लेने वाले लोग अंग्रेजी के ही अखबार पढ़ते हैं। हिंदी के नहीं। और यह गलत भी नहीं दिखता। हिंदी अखबारों के पाठकों की क्रय शक्ति को लेकर जो अवधारणा है उसी की वजह से अभी भी हिंदी के अखबारों को महंगी कारों या महंगे मोबाइलों के विज्ञापन नहीं मिलते। यहां तक कि विज्ञापनों की सरकारी दरों में भी यह फासला है। इसलिए एक समान प्रसार संख्या वाले अंग्रेजी और हिंदी के अखबारों की विज्ञापन से होने वाली आय में बड़ा फर्क है। और इसी का असर है कि पत्रकारिता पर होने वाले खर्च में भी अंग्रेजी किसी भी हिंदी अखबार की तुलना में कहीं आगे है।

चिंता इस पर भी करनी चाहिए कि क्यों हिंदी के किसी लेखक, कवि या पत्रकार को वह सम्मान कहीं मिलता नहीं दिखता जो अंग्रेजी सहित दूसरे समाजों में दिखता है। जहां तक सम्मान का सवाल है तो हिंदी लगातार अपना सम्मान खोती जा रही है। और इसकी शुरुआत को हमारे स्कूलों से ही देखा जा सकता है। लोग पेट काटकर भी अपने बच्चों को आसपास के कथित अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेज रहे हैं।

पिछले दिनों बीबीसी के पूर्व पत्रकार मार्क टुली ने अमर उजाला को दिए एक साक्षात्कार में कहा, "यह चिंता की बात है कि लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के खराब स्कूलों में भेज रहे हैं और बच्चा न ठीक से अंग्रेजी पढ़ पा रहा है और न हिंदी।"

छोटे कस्बों या गांवों में भी हिंदी पढ़ाने वाले सरकारी स्कूल अब सिर्फ मध्यान्ह भोजन के लिए आकर्षक रह गए हैं। वहां पढ़ाई का स्तर इतना खराब है कि बहुत सी जगह पांचवीं पढ़ने वाला बच्चा हिंदी का एक वाक्य भी नहीं लिख सकता।

पर जो हिंदी के ठीक और अच्छे वाक्य लिख सकते हैं वो भला क्या लिख रहे हैं? दूसरी भाषाओं की तुलना में शायद कुछ भी नहीं। पहले तो इसका आंकलन करना कठिन था लेकिन नई तकनीक ने इस तुलना को आसान कर दिया है। सिर्फ विकीपीडिया की बात करें तो अंग्रेजी में विकीपीडिया के लगभग 50 लाख आलेख हैं।

अंग्रेजी चूंकि दुनिया भर में पैठ गई है इसलिए हिंदी से उसकी तुलना न करें। लेकिन जर्मन भाषा बोलने, समझने वाले 95 लाख लोग हैं और उनके पास 18 लाख से अधिक विकीपीडिया पेज हैं। यहां तक कि हिब्रू समझने वाले महज 90 लाख लोग 1.77 लाख विकीपीडिया पेज बना लेते हैं। लेकिन 50 करोड़ हिंदी समझने, बोलने वालों ने अब तक सिर्फ एक लाख का आंकड़ा पार किया है।

अगर इंटरनेट ही भविष्य का माध्यम है तो यह आंकड़ा हिंदी के भविष्य का संकेतक भी है। इन आंकड़ों से अब गूगल जैसी इंटरनेट कंपनी भी चिंतित है। उसकी चिंता भाषा की चिंता नहीं है, बाजार की चिंता है। एक ताजा आंकड़ा बताता है कि इंटरनेट पर हिंदी पढ़ने वालों की संख्या प्रतिवर्ष 94 प्रतिशत के दर से बढ़ रही है। यानी हर वर्ष इंटरनेट पर हिंदी पढ़ने वाले लगभग दोगुने हो रहे हैं।

अनुमान है कि वर्ष 2017 तक 30 करोड़ हिंदी भाषी इंटरनेट पर होंगे। लेकिन इंटरनेट पर हिंदी की सामग्री इतनी कम है कि इंटरनेट पर न तो यह ज्ञान की भाषा होगी, न मनोरंजन की और न सूचना की।

"हिंदी का बाजार बड़ा है" यह जुमला हम बार बार सुनते हैं और खुश होते हैं। लेकिन यह बाजार दरअसल भाषा के लिहाज से बड़ा नहीं है, हिंदी भाषा बोलने, समझने वालों की दृष्टि से बड़ा है। इस जुमले से हिंदी भाषा के रुदालियों को खुश होने की कतई जरूरत नहीं है। गूगल से लेकर फेसबुक तक और नेस्ले से लेकर फोक्स वैगन तक सभी कंपनियों के लिए यह बाजार बड़ा है।

हिंदी के लेखक और कवि के लिए यह बाजार लगातार सिकुड़ रहा है। हिंदी के अखबारों की प्रसार संख्या लगातार बढ़ रही है। आने वाले दिनों में और बढ़ सकती है लेकिन बाजार जानता है कि जो अखबार पढ़ रहा है वह उसका खरीददार नहीं है इसलिए हिंदी के अखबारों में विज्ञापन से होने वाली आय का दबाव बढ़ता ही जाएगा और जाहिर है इसका असर पत्रकारिता पर होने वाले खर्चों पर भी पड़ेगा।

हिंदी के टेलीविजन चैनल जरूर बड़ी संख्या में लोग देख रहे होंगे क्योंकि वह उनकी मातृभाषा है। लेकिन वे हिंदी का कितना भला करेंगे इस पर बहस बेमानी है। साहित्य तो उनके एजेंडे पर कभी था नहीं, धीरे-धीरे पत्रकारिता भी 'बाइट' की पत्रकारिता तक सीमित हो गई है। एफएम स्टेशन का भोंडापन अगर किसी को हिंदी भाषा बचाने का साधन दिखता हो तो उसकी अक्ल पर तरस खाना चाहिए।

राजभाषा विभाग और वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग बनाकर और विश्व हिंदी सम्मेलन करके हिंदी का भला नहीं होने वाला है। इसके लिए जड़ों को ठीक करना होगा। जब तक बच्चे अपनी पाठशालाओं से अच्छी हिंदी पढ़कर नहीं निकलेंगे वे न हिंदी का साहित्य पढ़ेंगे और न अखबार। हिंदी की चिंता को कार्यशालाओं और सम्मेलनों से बाहर लाकर नीतियों तक लाना होगा और ऐसा हमारी अंग्रेजी परस्त नौकरशाही करने नहीं देगी।
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