नेपाल की करीब तीन करोड़ की आबादी में तकरीबन 90 फीसदी लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। नहीं भूलना चाहिए कि डिजिटल युग में सोशल मीडिया केवल मनोरंजन या संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह जनता की आवाज, सूचना के प्रवाह और राजनीतिक विमर्श का भी अहम मंच बन चुका है।
ऐसे में, इस पर प्रतिबंधों को युवा अनावश्यक दखलंदाजी की तरह तो देखते ही हैं, इससे यह संदेश भी जाता है कि सरकार नहीं चाहती कि उसकी नीतियों के खिलाफ किसी भी तरह के विमर्श को हवा मिले। आंकड़े इसकी पुष्टि भी करते हैं। बहुआयामी गरीबी सूचकांक-2024 के अनुसार, वहां 20 प्रतिशत से अधिक लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं।
सरकार हो या समाज, भ्रष्टाचार ने सभी स्तरों पर घुसपैठ कर ली है। कुल मिलाकर, 2008 में राजशाही की बर्खास्तगी के बाद नेपाल के लोगों ने जो स्वप्न देखा था, उसके पूरा न होने से लोगों में नाराजगी है, जो युवाओं के आंदोलन के रूप में प्रतिबिंबित हो रही है। चूंकि दक्षिण एशिया का भूगोल और राजनीति एक-दूसरे से गहरे से जुड़े हैं, लिहाजा इस घटनाक्रम पर भारत की भी नजर होगी।
भारत के संदर्भ में यह स्थिति अधिक चिंताजनक इसलिए भी है, क्योंकि उसके तकरीबन सभी पड़ोसी मुल्कों में किसी न किसी स्तर पर संकट बना ही हुआ है। पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद हो, बांग्लादेश की राजनीतिक उथल-पुथल, म्यांमार का गृहयुद्ध हो या फिर राजनीतिक व आर्थिक अस्थिरता से उबरता श्रीलंका, ये सभी भारत की कूटनीतिक चिंताओं के विषय लगातार बने हुए हैं।
नेपाल की स्थिति, जहां मुख्य लड़ाई राजशाही समर्थकों व विरोधियों के बीच है, हालांकि एक वर्ष पूर्व के बांग्लादेश से अलग है, फिर भी भारत को अधिक सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि, नेपाल जैसे संवेदनशील राजनीतिक इतिहास वाले देश में, जहां राजशाही के खात्मे के बाद से अब तक करीब 17 वर्षों में कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है, असंतोष की चिंगारी कब आग में बदल जाए और अवांछित शक्तियों को अस्थिर स्थितियों का फायदा उठाने का मौका मिल जाए, कहा नहीं जा सकता।
हालांकि, इसके कसूरवार वहां के राजनीतिक दल ही हैं, जिनकी अवसरवादिता और वैचारिक भटकाव का खामियाजा नेपाल की जनता अब तक भुगत रही है। समय रहते नेपाल को समझना होगा कि जनता की आवाज को दबाने की कोशिश अंतत: शासन को ही अस्थिर करती है।