मणिपुर की ग्यारहवीं विधानसभा के लिए आगामी चार व आठ मार्च को होने जा रहे चुनाव में मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह के लिए प्रतिकूलताओं का पहाड़ खड़ा है। कांग्रेस के इबोबी सिंह हैट्रिक लगा चुके हैं। राज्य में विधानसभा की कुल 60 सीटें हैं और पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की 50 सीटों पर जीत हुई थी किंतु इस बार उसके सामने कई प्रतिकूलताएं हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती इरोम चानू शर्मिला ने खड़ी की है। सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून को हटाने की मांग को लेकर 16 साल तक लगातार अनशन कर चुकी इरोम शर्मिला अब ओकराम इबोबी सिंह के खिलाफ विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही हैं। अनशन तोड़ने के बाद इरोम शर्मिला ने पीपुल्स रिसर्जेंस ऐंड जस्टिस अलायंस पार्टी का गठन किया था। इस चुनाव में उनकी पार्टी का मुख्य मुद्दा सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून का खात्मा ही है। इस मुद्दे पर उन्हें जनता का साथ मिलेगा, इसे लेकर कोई संदेह नहीं है। इरोम शर्मिला के अलावा कोई पार्टी इस कानून को खत्म करने की बात नहीं करती।
ओकराम इबोबी सिंह के लिए इस चुनाव में दूसरी मुश्किल यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की स्थिति खस्ता हाल है, जबकि पूर्वोत्तर में असम और अरुणाचल में सरकार बनाने के बाद भाजपा अब मणिपुर में भी अपनी ताकत बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है।
इबोबी सिंह के लिए तीसरी प्रतिकूलता कानून-व्यवस्था बनाए रखने में उनकी नाकामी है। विधानसभा चुनाव के ठीक पहले मणिपुर के कुछ हिस्सों में मैतेई व नगा समुदायों के बीच हिंसा भड़की। कर्फ्यू के बावजूद नगा चरमपंथी संगठन एनएससीएन (आई-एम) गुट की हिंसा नहीं रोकी जा सकी। मैतेई लोगों की नाराजगी की बड़ी वजह नगा लोगों की पिछले ढाई महीने से लागू आर्थिक नाकेबंदी है। इस नाकेबंदी के कारण घाटी में पेट्रोल 350 रुपये लीटर मिल रहा है, गैस का एक सिलिंडर 2,000 रुपये में मिल रहा है, आलू 100 रुपये और प्याज 50 रुपये किलो मिल रहा है। सवाल है कि जब दो माह पहले नगा लोगों ने इंफाल घाटी की आर्थिक नाकेबंदी शुरू की, तो राज्य सरकार हाथ पर हाथ रखकर क्यों बैठी रही। समस्या दरअसल तब शुरू हुई, जब मणिपुर सरकार ने सात नए जिले बनाने की घोषणा की। नगा समुदाय और नगा संगठनों ने उसका यह कहते हुए विरोध किया कि वे ऐतिहासिक तौर पर नगा इलाके हैं और उनके प्रस्तावित ग्रेटर नगालिम का हिस्सा हैं। हालांकि आर्थिक नाकेबंदी का अब तक चुनावों में कांग्रेस को लाभ ही मिला है। देखना यह है कि भाजपा इसे चुनावी मुद्दा बनाने से रोक पाने में सफल होती है या नहीं।
मणिपुर में भड़की हिंसा दरअसल मैतेई व नगा समूहों के बीच अपनी पहचान और वर्चस्व को लेकर बढ़ते तनाव की देन है। इसे रोकने में जिस तरह राज्य सरकार ने हाथ खड़े किए, उससे लगता है कि सरकार की मंशा दोनों समुदायों को आपस में लड़ाने-भिड़ाने की ही रही है। समूचे पूर्वोत्तर की जनजातियों को शासन पहले भी लड़ाता-भिड़ाता रहा है। पूर्वोत्तर में बोडो और असमिया, खासी और गारो, कुकी और नगा समुदाय के बीच संघर्ष की खबरें अक्सर आती रहती हैं। इबोबी सिंह के पिछले 15 वर्षों के मुख्यमंत्री काल में मणिपुर की दो जनजातियों-नगा तथा कुकी के बीच तनाव के फलस्वरूप बड़ी खिलाड़ी माने जाने वाली कांग्रेस का इस बार दो मजबूत विपक्षी पार्टियों से सामना होगा। इसलिए भी इस बार का चुनाव बेहद दिलचस्प होने जा रहा है।