संत सुकरात सत्य और सदाचार को सर्वोपरि धर्म बताया करते थे। उनका मत था कि बड़े से बड़ा संकट आने पर भी मानव को सत्य व न्याय पर अटल रहना चाहिए। उनकी तेजस्विता और निर्भीकता देखकर गलत कर्मों में लगा वर्ग उनका विरोधी बन गया। उन्हें सत्य से विचलित करने के लिए धमकियों का सहारा लिया गया।
इसके बावजूद वह सत्य पर अटल रहे, तो उन पर गलत आरोप लगाकर मृत्युदंड सुना दिया गया। निर्णय दिया गया कि उन्हें जहर पिलाकर मार डाला जाए। नियत तिथि को सुकरात को पिलाने के लिए जहर पीसा जा रहा था। सुकरात के अनुयायी भक्त रो रहे थे। यह देखकर सुकरात जहर पीसने वाले के पास पहुंचे तथा बोले, लगता है कि तुमने कभी जहर नहीं पीसा है। जल्दी-जल्दी पीसकर मुझे पिलाओ, जिससे पास बैठे लोगों का रोना बंद हो जाए।
सुकरात को प्याले में भरकर जहर पिलाया गया। कुछ देर बाद वह बोले, जहर का प्रभाव दिखाई देने लगा है। हाथ-पैर सुन्न और निर्जीव होने लगे हैं, परंतु मित्रो! यह जहर मेरे भीतर के शील व सत्य का बाल भी बांका नहीं कर सकता। शील और सत्य ही तो मेरी आत्मा है। आत्मा अमर है, उसे यह कैसे मारेगा? यह कहते-कहते संत सुकरात शांत हो गए। उनके अनुयायी उनकी निर्भीकता देखकर नतमस्तक हो उठे।