मंगलवार को देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी की कार्य समिति भविष्य का रोडमैप तैयार करने के लिए जब बैठेगी, तो सोनिया और राहुल गांधी के सामने वह परीक्षा की घड़ी होगी। सरसरी तौर पर देखें, तो नेतृत्व के प्रमुख मुद्दे पर बात करने के मामले में इन दोनों पर किसी किस्म का दबाव नहीं है। लेकिन बैठक में सोनिया गांधी द्वारा यह संकेत देने की संभावना है कि अगले तीन वर्षों तक पार्टी अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालने के लिए वह शायद ही तैयार हों। अगर उम्र, स्वास्थ्य और उनकी मानसिकता कांग्रेस का नेतृत्व करने की अनुमति न दें, और आगामी दिनों में वह पार्टी की सलाहकार और मार्गदर्शक की भूमिका तक सिमट जाएं, तो पार्टी को एक नया नेता चुनना होगा।
राहुल गांधी को भी पार्टी में अपनी भूमिका के बारे में अब स्पष्ट होना होगा और सामने आना होगा। सवाल यह है कि अगर कांग्रेस के नेतृत्व की जिम्मेदारी उनके कंधे पर आती है, तो क्या वह इसे पूरी संजीदगी से निभाने के लिए तैयार होंगे और राजनीति को अपना पूर्णकालिक करियर बनाएंगे? उसके बाद बड़ा सवाल यह होगा कि 130 साल पुरानी इस राजनीतिक पार्टी को राहुल गांधी किस मार्ग से आगे ले जाएंगे और क्या दिशा देंगे। पार्टी के नेतृत्व की जिम्मेदारी उन्हें बड़ी आसानी से मिल सकती है-पहले कांग्रेस कार्यसमिति इसे मंजूरी देगी, फिर आगामी मार्च में अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी इसे अनुमोदित कर देगी।
लेकिन इसमें एक बड़ी अड़चन है। यह अड़चन है, कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने के मामले में राहुल गांधी का रवैया। दिग्विजय सिंह लगातार इसकी जरूरत बता रहे हैं, लेकिन वर्ष 2004 से ही राहुल गांधी इस संभावना को टालते आ रहे हैं। ऐसे में, पार्टी के अंदर अनुशासन कायम करने और चुनाव कराने आदि पर जोर डालने की उनकी कोशिश खोखली ही होगी। सबसे बड़ी बात यह कि जब स्थितियां कांग्रेस के अनुकूल नहीं हैं, तब राहुल गांधी के सामने बड़ा दबाव पार्टी को पटरी पर लाने का होगा।
अगर कांग्रेस के सांगठनिक चुनाव के वर्ष में 'लोकतांत्रिक' राहुल अध्यक्षता के लिए चुनाव का रास्ता चुनते हैं, तो पार्टी का आंतरिक गणित, ऊर्जा और लक्ष्य-सारा कुछ इससे प्रभावित होगा। कोई चाहे, तो प्रणब मुखर्जी की हाल में आई किताब, इंदिरा डिकेड को पढ़कर जान सकता है कि 1977 की चुनावी हार के बाद इंदिरा गांधी जैसी शख्सियत ने जब पार्टी को नई दिशा देने की कोशिश की थी, तो उन्हें कितना झेलना और संघर्ष करना पड़ा था। यह तर्क दिया जा सकता है कि मौजूदा कांग्रेस में 1977-78 जैसे बड़े किरदार नहीं हैं, जो सैद्धांतिक आधार पर पार्टी नेता का विरोध कर सकें, न ही तब जैसे कांग्रेस के क्षेत्रीय नेता मजबूत स्थिति में हैं। इसके अलावा सोनिया-राहुल कांग्रेस के नजरिये और कामकाज के तरीके भी इंदिरा गांधी के तरीके से बहुत अलग हैं। इसके बावजूद यह नहीं मान सकते कि जिम्मेदारी संभालने के बाद राहुल गांधी और उनकी टीम रातोंरात कांग्रेस का कायापलट कर देगी या शेष पार्टी पूरी तरह से राहुल गांधी का समर्थन करेगी।
काग्रेस की एक बड़ी चुनौती उसका आंतरिक कलह भी है। इन दिनों महाराष्ट्र, असम, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, राजस्थान जैसे तमाम राज्यों में बगावत के सुर तेज हैं। इसका कारण पार्टी का सांगठनिक चरित्र है। असल में, कांग्रेस के अंदर सत्ता के विकंद्रीकरण की बातें तो खूब कही जाती हैं, पर उसे अमल में नहीं लाया जाता। पार्टी की नब्ज पढ़ने वाले जानते हैं कि आखिर कर्नाटक में क्यों विवाद नहीं है। इसकी वजह वहां के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के नेतृत्व कौशल के साथ ही उनका दिल्ली से लगातार संपर्क बने रहना भी है। थोड़ी-सी परेशानी में भी वह भागे-भागे दिल्ली पहुंचते हैं। यानी जिन-जिन जगहों पर कांग्रेस आलाकमान का सीधा दखल है, वहां स्थिति नियंत्रण में है।
प्रदेश कांग्रेस समितियों के प्रमुखों को चिट्ठी लिखकर सोनिया गांधी ने कांग्रेस विचारधारा को लेकर भी आम सहमति बनाने की बात कही है। मौजूदा दौर में यह करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस की छवि 'हिंदू विरोधी' पार्टी के रूप में बनती जा रही है। लेकिन दिक्कत यह है कि धर्मनिरपेक्षता को लेकर कांग्रेस के विश्वास में कमी है। उसे 'बैक टु बेसिक्स' दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। बैक टु बेसिक्स का अर्थ यही है कि कांग्रेस मौजूदा संकट का हल अपने इतिहास से ढूंढे। उसे न सिर्फ धर्मनिरपेक्षता पर नेहरू के दृष्टिकोण को समझना होगा, बल्कि कमोबेश खत्म हो चुकी कांग्रेस को 1977 में दोबारा खड़ा करने की इंदिरा गांधी की रणनीति जाननी होगी। हालांकि कांग्रेस कार्यसमिति के पास नेतृत्व के मुद्दे पर थोड़ा समय लेने और फिलहाल शब्दाडंबर तक ही अपने को सीमित रखने का एक अवसर है। लेकिन कांग्रेस अगर शुतुरमुर्ग जैसा रवैया अपनाए, यानी वह अपने कार्यकर्ताओं से तो संघर्ष का आह्वान करे, मगर चाय व ढोकले का जलपान कर इस तरह दोपहर की नींद ले, जैसे कुछ हुआ ही न हो, तो इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और घातक कुछ नहीं होगा।
लिहाजा कांग्रेस का भविष्य अब पूरी तरह से सोनिया गांधी पर निर्भर है, और पार्टी को पुनः पटरी पर लाने के लिए वह ऐतिहासिक भूमिका निभाने के बारे में सोच सकती हैं। नियति ने उन्हें सहजता से कठिन निर्णय लेने का भार सौंपा है। कांग्रेस के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने के लिए यह मंगलवार सोनिया गांधी के लिए एक और विराट अवसर होगा।
-वरिष्ठ पत्रकार और 24 अकबर रोड के लेखक