यश मालवीय के गीतों से गुजरते हुए एक किस्म के अपनत्व का बोध होता है, क्योंकि इनके शब्द अपनों के बीच के होते हैं। एक बानगी देखिए-
बहुत नीली, बहुत गहरी, बहुत गाढ़ी
नींद कागज की तरह सौ बार फाड़ी।
ये पंक्तियां उनके नए गीत संग्रह `नींद कागज की तरह' से हैं। गीत संग्रह की खासियत है उसकी कविताओं के विषयों का विस्तार। संग्रह में पाठक को दिल और दिमाग, दोनों के संवाद मिलेंगे। उदाहरण के लिए इस संग्रह का गीत `उतरती सर्दियां हैं' ही लें।
यहां दिल की गहराइयों में बसी प्रिय की स्मृतियां सर्दी के बहाने उभर आती हैं, तो दूसरी ओर `कंप्यूटर पासवर्ड मांग रहा है' जैसा गीत भी है, जो आज के दौर की विडंबना पर विचार करने को विवश करता है। संग्रह के पैंसठ गीतों में हरेक गीत आज के संदर्भ में जीवन जी रहा है। कुछ गीत दिल के तार छेड़ जाते हैं, तो कुछ दिमाग को झकझोर जाते हैं। गीतों में एक ताजगी का अहसास है।