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नजरिया: आत्मनिर्भर महिलाओं की दुनिया और पुरुषवादी समाज में आधी आबादी की सफलता पर कुछ सवाल

तस्लीमा नसरीन
Updated Mon, 15 Jan 2024 07:40 AM IST

सार

यह मानना भ्रामक है कि निचले तबके की स्त्रियों को ही पुरुष वर्चस्ववादी समाज का दबाव या अत्याचार सहना पड़ता है। उच्च वर्ग की महिलाओं को भी उतने ही समझौते करने पड़ते हैं।
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नीतू कपूर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई


यह मानना भ्रामक है कि निचले तबके की स्त्रियों को ही पुरुष वर्चस्ववादी समाज का दबाव या अत्याचार सहना पड़ता है। उच्च वर्ग की महिलाओं को भी उतने ही समझौते करने पड़ते हैं। बांग्लादेश की चर्चित अभिनेत्री परीमणि ने कुछ दिन पहले घोषणा की थी कि चूंकि उनके पति ने निरंतर उनका शारीरिक-मानसिक शोषण किया, इसलिए वह पति से सारे रिश्ते खत्म कर रही हैं। मानने का कारण है कि उनकी उस घोषणा के बाद उनके परिचितों-परिजनों का उन पर अपना फैसला वापस लेने का दबाव बना। कुछ लोग तो सोशल मीडिया पर उन पर उलजुलूल आरोप लगाने तक से बाज नहीं आए। नतीजा वही हुआ, जिसकी आशंका थी। आखिरकार परीमणि को समझौता करना पड़ा, और फेसबुक पर पति से तलाक लेने की जो सूचना उन्होंने पोस्ट की थी, वह उन्होंने डिलीट की। परिवार और समाज के दबाव पर परीमणि को उसी पुरुष के साथ रहने के लिए विवश होना पड़ा, जिससे वह अलग होना चाहती थीं। जाहिरहै, उन्हें फिर से वही शारीरिक-मानसिक शोषण का सामना करना पड़ेगा। फिर वह अंदर-बाहर से टूटती-घुटती रहेंगी। फिर भी चुप रहना पड़ेगा। बांग्लादेश में असंख्य महिलाओं की चहेती परीमणि को असंख्य शोषित महिलाओं की तरह गूंगी और सहनशील बनकर जीवन बिताना पड़ेगा। पति की सफलता के पीछे उनके योगदान को स्वीकारा जाएगा। लेकिन उन्हें अपनी सफलता के लिए इंतजार करना पड़ेगा। और क्या पता, पारिवारिक-सामाजिक दबावों के आगे समर्पण कर देने वाली परीमणि को वह सफलता कभी मिले ही न, जो वह चाहती हैं। वह सफलता शायद उन्हें अकेले रहने पर मिल सकती है।


जिस तरह हमारे समाज में महिलाओं के लिए पति की उपस्थिति जरूरी है, उसके बिना विवाहित स्त्री के जीवन का कोई मूल्य नहीं है, वैसे ही संतान का होना भी जरूरी है। ये समाज के कुछ पैमाने हैं, जिन्हें आज भी पहले की तरह लागू किया जाता है। दरअसल पति के साथ रहने और संतान को जन्म देने जैसे मानक सैकड़ों-हजार वर्षों से स्त्रियों को बांध देने के लिए समाज में लागू हैं। इस दुनिया में ऐसी असंख्य शिक्षित, आत्मनिर्भर और सजग औरतें हैं, जिन्होंने शादी नहीं की, न ही संतानों को जन्म दिया। फिर भी उनका जीवन व्यर्थ नहीं हुआ।


महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में हमारे समाज का रवैया कैसा है, इसका पता बांग्लादेश की एक हालिया घटना से चलता है। वहां मजनूं नाम के एक लुटेरे व नशेड़ी को ढाका विश्वविद्यालय की एक छात्रा से बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। उसकी गिरफ्तारी के बाद पुलिस अधिकारी ने मीडिया में जो बयान जारी किया, उसके मुताबिक, मजनूं का यह अपराध उसके पहले के अपराधों की तुलना में ज्यादा गंभीर है। उसने इससे पहले क्या अपराध किया था? पता चलता है कि इससे पहले भी उसने कई गरीब और दिव्यांग लड़कियों के साथ यही घृणित अपराध किया था। पुलिस अधिकारी शायद यह कहना चाह रहे हों कि एक के बाद अपराध करने के कारण मजनूं का जुर्म ज्यादा गंभीर है। यह सही हो सकता है, लेकिन पुलिस अधिकारी के बयान से इसका भी आभास मिलता है कि एक पढ़ी-लिखी लड़की के साथ यौन अपराध गंभीर मामला है। जिस समाज में पुलिस-प्रशासन के उच्च पदों पर आसीन लोग तक स्त्री के खिलाफ अपराधों में फर्क करते हैं, उस समाज में महिलाओं को न्याय दिलाना बहुत आसान नहीं है। यह मानने का कारण है कि गरीब, मजबूर और साधनहीन महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों के प्रति प्रशासन-व्यवस्था का रवैया अमीर, पढ़ी-लिखी और प्रभावशाली महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों से भिन्न होता है। उसे कौन समझाए कि यौन अपराध चाहे किसी के भी साथ हो, घृणित और निंदनीय है, और ऐसे हर मामले में पुलिस-प्रशासन का रवैया एक जैसा होना चाहिए।


लेकिन जिस बांग्लादेश में समाज निरंतर कट्टरता की ओर जा रहा है, जहां लड़कियों, स्त्रियों के प्रति रोज ही नए दिशा-निर्देश जारी होते हैं, वहां यौन अपराधों के खिलाफ एक जैसी सख्ती और प्रतिबद्धता की उम्मीद करें भी, तो कैसे! वहां के स्कूली पाठ्यपुस्तक में सलवार-कमीज और दुपट्टे में एक लड़की की तस्वीर छापकर कहा गया है कि यही लड़कियों की उपयुक्त पोशाक है। आगे इसमें कारण बताते हुए कहा गया है कि शारीरिक बदलावों के कारण बड़ी होती लड़कियों को झुककर चलना पड़ता है। लेकिन कमीज पर दुपट्टा रख लेने से वे सीधा होकर चल सकेंगी।


यह तो एक नमूना है। आने वाले दिनों में बुर्के वाली महिलाओं की तस्वीर छापकर बताया जाएगा कि महिलाओं के लिए यही उपयुक्त पोशाक है। बांग्लादेश के समाज में कट्टरवादी सोच के साथ कट्टरवादी पोशाकों के प्रति रुझान जिस तरह बढ़ता जा रहा है, उसमें लगता नहीं है कि बुर्के पर जोर देने का कोई विरोध होगा। पूछा जाना चाहिए कि शरीर में बदलाव होने पर लड़कियों को शर्मिंदा क्यों होना चाहिए? और अतिरिक्त कपड़ा या पर्दा इसका हल क्यों होना चाहिए? क्या पुरुषों के शारीरिक बदलाव के बारे में भी यही तर्क दिया जाता है? हैरानी की बात यह है कि इस तरह के तर्क मौजूदा 21वीं सदी में भी दिए जा रहे हैं। इन कट्टरवादियों का तर्क यह भी है कि मर्यादा और गरिमा में रहने वाली लड़कियों, स्त्रियों के साथ अपराध कम होते हैं। जाहिर है, यह कुतर्क ही है। स्त्रियों पर होने वाले अपराधों को कम करने के लिए महिलाओं का पर्दे और बुर्के में ढका रहना जरूरी नहीं है। बल्कि ज्यादा जरूरी यह है कि पुलिस-प्रशासन चुस्त-दुरुस्त हो, और समाज में स्त्रियों के प्रति जागरूकता पैदा करने का प्रयास हो।

 
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