यह विडंबना ही है कि नागरिक आजादी की लड़ाई लड़ने वाले और मीडिया की नजरों में हीरो बन चुके एडवर्ड जोसेफ स्नोडेन अपने तीसवें जन्मदिन पर हांगकांग के एक अनजाने से होटल के बंद कमरे में निर्वासन की त्रासदी भोग रहे हैं। अपने लिए यह कठिन राह उन्होंने खुद चुनी है, क्योंकि वह ऐसे समाज में नहीं रहना चाहते, जहां उनके कुछ भी करने या कहने पर खुफिया निगाह रखी जाती हो। सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी (सीआईए) में तकनीक सहायक रह चुके स्नोडेन पिछले चार वर्षों से नेशनल सिक्यूरिटी एजेंसी (एनएसए) के लिए काम कर रहे थे।
वह चर्चा में तब आए, जब उन्होंने एनएसए की निगरानी परियोजना की सच्चाई सबके सामने खोल कर रख दी। वह एक ऐसा जीवन बिता रहे थे, जिसमें उन्हें किसी चीज की कोई कमी नहीं थी। दुनिया में ऐसे कितने लोग होंगे, जो दो लाख अमेरिकी डॉलर के वेतन, हवाई में आलीशान मकान और खूबसूरत महिला मित्र का साथ छूटने की परवाह न करते हुए स्नोडेन का रास्ता चुनेंगे। उनके खुलासे से न सिर्फ दुनिया में लोकतंत्र का सबसे बड़ा पैरोकार होने का दावा करने वाले अमेरिका की असलियत सामने आ गई, बल्कि यह भी पता चल गया है कि सर्विलांस गतिविधियों के बारे में एनएसए ने किस तरह अमेरिकी संसद में लगातार झूठ बोला।
भले ही स्नोडेन ने विधिवत शिक्षा न पाई हो, लेकिन उनके पास नौकरियों की कभी कमी नहीं रही। उन्हें जानने वाले बताते हैं कि स्नोडन ‘कंप्यूटर के जीनियस’ हैं। उनके पिता के मुताबिक, स्नोडन एक बेहद संजीदा लड़का है, जो अपने आसपास के लोगों का पूरा ध्यान रखता है। स्नोडेन के व्यक्तित्व पर बौद्ध धर्म की गहरी छाप है।
शायद यही वजह है कि झूठ उन्हें बर्दाश्त नहीं होता। खुफिया जानकारियां देने में भी वह ‘वेरेक्स’ कोड का सहारा लेते थे, जिसका लैटिन में मतलब होता है, ‘सच बयां करने वाला।' स्नोडेन ने जो कर दिखाया है वह उनके साहस ही नहीं, बल्कि उनकी लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता का भी परिचय देता है। उनका मानना है कि पैसा जीवन के लिए जरूरी तो है, लेकिन वही सब कुछ नहीं है। अगर वह चाहते तो इन जानकारियों के बदले किसी भी देश से मुंहमांगा धन पा सकते थे, पर उनके लिए उसूल कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। उनका मानना है कि गलत काम करने पर ही कोई मनुष्य डरता है, और उन्होंने तो कुछ गलत नहीं किया।