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कविता करकरे की मिसाल से कुछ सीखे समाज

Fri, 03 Oct 2014 11:54 PM IST
मनीषा सिंह
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मुंबई हमले के शहीद एटीएस चीफ हेमंत करकरे की पत्नी कविता करकरे यों तो अब इस दुनिया में नहीं हैं, पर उनकी आंखें दुनिया को अब भी देखती रहेंगी। कविता करकरे का 29 सितंबर को ब्रेन स्ट्रोक की वजह से निधन हो गया। मगर गहन दुख के उस क्षण में भी उनके बच्चों ने सराहनीय हिम्मत दिखाते हुए उनकी किडनियां और आंखें जरूरतमंद मरीजों को दान कर दीं।
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कविता करकरे के बारे में दुनिया ज्यादा नहीं जानती है। सिवाय इसके कि वह एक शहीद की पत्नी थीं और मुंबई आतंकी हमले के बाद उन्होंने असीम धैर्य का परिचय दिया था। पर अब जिस तरह से उनकी मृत्यु के बाद उनके शरीर के कई महत्वपूर्ण अंग कुछ जरूरतमंद मरीजों की मदद करेंगे- यह योगदान कविता करकरे को लंबे समय तक याद रखे जाने वाले उदाहरण के रूप में स्थापित कर गया है। ऐसी और भी मिसालें हैं। मुंबई में नेशनल कमीशन फॉर वुमेन की एक सदस्य निर्मला सामंत प्रभावलकर की 18 वर्षीया बेटी हिमांगी की जब ब्रेन हैमरेज से अचानक मृत्यु हो गई, तो मां निर्मला ने उसकी किडनी और लीवर जरूरतमंद मरीजों में दान कर दी। हिंदी के प्रख्यात कथाकार विष्णु प्रभाकर भी इसी सूची में शामिल हैं, जिनकी मृत्यु के बाद उनकी आंखें, दिल, किडनी, लीवर के साथ शरीर की हड्डियां तक उन लोगों के काम आईं, जो इनके अभाव में शायद अधूरे रहते या फिर शायद जीवित ही न होते। कविता करकरे, हिमांगी या फिर विष्णु प्रभाकर जैसे कुछ उदाहरण हमारे सामने आते रहते हैं। पर इनसे हमारे समाज में कोई ऐसी बड़ी हलचल नहीं हुई है कि लोग-बाग आम तौर पर वैसा ही करें, जैसा इन्होंने किया।

असल में, सामाजिक संस्कारों के कारण अपने देश में व्यक्ति या परिजन अंगदान या अस्थि दान के लिए तैयार नहीं होते। इस वजह से भारत में अंगदान की दर काफी कम है। मौजूदा वक्त में हमारे देश में प्रति दस लाख में से सिर्फ 16 लोग ही अंग दान करते हैं। देश में हर साल एक लाख लोगों को नेत्रदान के जरिये मिलने वाले कार्निया की जरूरत होती है, जबकि नेत्रदान से सिर्फ 25 हजार कार्निया मिल पा रहे हैं। इसके अलावा एक से डेढ़ लाख लोगों की किडनी बदलने की जरूरत हर साल पैदा होती है, जबकि दान में इसकी संख्या औसतन चार हजार ही रहती है। अंगदान का चलन नहीं होने की वजह से अंगों के अवैध कारोबार को बढ़ावा मिलता है।
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दानवों के खिलाफ संघर्ष में देवताओं की मदद के लिए अपना शरीर गलाकर वज्र बनाने की अनुमति देने वाले महर्षि दधीचि का प्रसंग हर किसी को याद होगा, पर जब बारी सामाजिक उद्देश्य के लिए अंगदान करने की आती है, तो ज्यादातर लोग पीछे हट जाते हैं। कई तो मानते हैं कि यदि मृत्यु के बाद शरीर के कुछ अंग निकाल लिए गए, तो अगले जन्म में शरीर उन अंगों से वंचित होगा। यानी सामाजिक रीतियां, धार्मिक विश्वास और परिजनों का विरोध- यह सब कुछ अंगदान में बाधक बनता हैैं। अच्छा होगा, यदि समाजसेवी और धर्मगुरु इस बारे में जागरूकता फैलाएं और सामाजिक संगठन व अस्पताल अंगदान की प्रक्रिया को और सरल बनाएं।
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