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समाज: कहां गए वे पारिवारिक मूल्य, नई पीढ़ी का मानस और चिंताजनक व्यवहार

वीरेंदर कपूर, लेखक एवं शिक्षाविद Published by: Pavan Updated Sat, 04 Apr 2026 08:18 AM IST

सार

युवा पीढ़ी, जिसे आमतौर पर ‘जेन जेड या जेन-जी’ कहा जाता है, खुद को ‘सब कुछ जानने वाली’ पीढ़ी मानती है, कम से कम उन्हें तो ऐसा ही लगता है। उनके लिए माता-पिता अब केवल सलाहकार ही नहीं रह गए हैं, बल्कि वे सेवा प्रदाता भी बन गए हैं। 
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कहां गए वे पारिवारिक मूल्य - फोटो : अमर उजाला


आपने अक्सर किसी न किसी से सुना होगा-मेरी मां कहती थी...।  नैतिक कंपास के जरिये माता-पिता द्वारा हमें हमेशा दिशा दिखाई जाती थी, जिसे बेहतरीन परवरिश और पारिवारिक मूल्य कहा जाता था। माताएं एक विशाल ज्ञानकोश थीं। भले ही वे बहुत अधिक पढ़ी-लिखी न हों, फिर भी बच्चे मां से बुनियादी संस्कार सीखने को हमेशा तत्पर रहते थे। रुडयार्ड किपलिंग ने कहा है, ‘ईश्वर हर जगह मौजूद नहीं हो सकते, शायद इसीलिए उन्होंने मां को बनाया।’


पिता की भूमिका भी बहुत ही सकारात्मक होती है। अमिताभ बच्चन कई बार अपने पिता की सलाह का जिक्र करते हुए कहते हैं, ‘बाबूजी ने यह कहा था।’ मुझे याद है अमिताभ बच्चन ने कहा था, ‘बाबूजी कहते थे, जो मन का, वो अच्छा; जो मन का नहीं, वह और भी अच्छा।’ इसका बहुत गहरा मतलब था। इसका मतलब है कि जब आप कुछ चाहते हैं और वह आपको मिल जाता है, तो यह अच्छा है; पर यदि उसकी जगह आपको कुछ और मिल जाए, तो वह और भी बेहतर होता है।’ यह बिल्कुल सच है। मैंने अपनी जिंदगी में भी यह देखा है कि जब एक रास्ता बंद हो जाता है, तो भगवान आपको कुछ ऐसा देते हैं, जो उससे भी बेहतर होता है। अनुपम खेर भी अपने दिवंगत पिता के बारे में बहुत ही स्नेह और आदर से बात करते हैं। फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार को अपनी मां से हिम्मत मिली। वह अपनी सफलता का श्रेय अपनी मां को ही देते हैं। व्यापक अर्थ में, ये ‘संस्कार’ ही हैं। ये मूल्य माता-पिता द्वारा ही सिखाए जा सकते हैं। 


कोई पूछ सकता है कि परिवार में जब सबको माता-पिता से एक ही संस्कार मिलता है, तो एक ही परिवार के चार लड़के अलग-अलग व्यक्तित्व वाले इन्सान क्यों बन जाते हैं? कोई डॉक्टर, कोई पुलिस अधिकारी, कोई सफल वकील, तो कोई गुंडा बन जाता है। इसका सरल जवाब है-सबसे महत्वपूर्ण है माता-पिता द्वारा दिए गए संस्कारों को ग्रहण करना। यहां भी बुद्धि काम करती है, क्योंकि कोई भी सृष्टि की शक्ति को नहीं समझ सकता। हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं। हर युवा को लगता है कि वह समझदार है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण आप देखते हैं कि 23 साल का व्यक्ति 22 साल के व्यक्ति को सलाह दे रहा है! युवा पीढ़ी, जिसे आमतौर पर ‘जेन जेड या जेन-जी’ कहा जाता है, खुद को ‘सब कुछ जानने वाली’ पीढ़ी मानती है, कम से कम उन्हें तो ऐसा ही लगता है। 


जैसे सेना में कई सेवाएं होती हैं, जिनके लिए सेवा प्रदाता होते हैं, ठीक वैसे ही आज के माता-पिता भी अब केवल सलाहकार नहीं रह गए हैं, बल्कि वे भी सेवा प्रदाता बन गए हैं। आधुनिक युग में चीजें तेजी से बदली हैं। बच्चे अब सलाह लेना नहीं चाहते, क्योंकि यह उन्हें बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है। वे कहते हैं, ‘मुझे यह मत बताओ कि क्या सही है और क्या गलत; बस मेरी इच्छा पूरी कर दो।’


एक बार मैं एक छात्र की विधवा मां से बात कर रहा था, जो हमारे इंस्टीट्यूट में एमबीए में दाखिला ले रहा था। वह अपने ‘बच्चे’ को ‘सेट’ करने के लिए देहरादून से दो ट्रेनें बदलकर आई थीं। मैंने उनसे पूछा, ‘आप यहां क्यों आई हैं?’ उन्होंने जवाब दिया, ‘बच्चे को सेट करना है, उसका कमरा ठीक करना है, बिस्तर लगाना है।’ वह लड़का मेरे सामने ही खड़ा था, जो मुझसे भी ज्यादा लंबा था, लगभग छह फीट से भी ऊंचा। लेकिन यह सब सुनकर उसे बिल्कुल भी शर्म महसूस नहीं हो रही थी।


शादी हो जाने के बाद, बच्चों की देखभाल करने के लिए भी माता-पिता ही मौजूद होते हैं। उनसे यह भी उम्मीद की जाती है कि वे घर का खाना भी बनाएंगे। यहां तक कि एयर कंडीशनर और कारों की सर्विसिंग तथा मरम्मत का काम भी माता-पिता को ही सौंप दिया जाता है। जो भारतीय माता-पिता विदेश जाते हैं, वे अपने बेटे-बेटियों के लिए ‘बर्तन, झाड़ू-पोछा-ये सारे काम खुद करते हैं। आजकल तो जरा-सी बात पर ही तलाक हो जाते हैं। इसमें किसी के दखल की जरूरत नहीं समझी जाती। इस मामले में वे पूरी तरह आजाद हैं और अपने फैसले खुद लेते हैं। किसी ‘मशविरे’ की कोई गुंजाइश नहीं है। और ‘सलाह’ देने की बात तो बिल्कुल ही भूल जाइए। वे अलग होने का फैसला करते हैं, और यह सब पलक झपकते ही हो जाता है, भले ही उनके ‘बच्चे जाएं भाड़ में’। तलाक के बाद दी जाने वाली रकम के मामले में कभी-कभी माता-पिता फंस जाते हैं। आखिर, आपकी बचत कब काम आएगी? एक स्टार्टअप शुरू करने के लिए, आप माता-पिता की खुशियों को दांव पर लगा देते हैं, पैसे उधार लेते हैं और फिर सब बर्बाद कर देते हैं। आपको इस बात की कोई परवाह नहीं होती कि कहीं उन्हें हार्ट अटैक ही न आ जाए। यह हर घर की कहानी है। हर दूसरे घर में ऐसा होता है। एक दोस्त ने कहा, ‘हमारी पीढ़ी ने अपने माता-पिता के लिए बिस्तर लगाए थे, और अब हम अपने बच्चों के लिए ऐसा करते हैं।’
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स्वार्थी पीढ़ी अपने माता-पिता के साथ समय बिताने की स्वाभाविक इच्छा का फायदा उठाती है, और फिर उन्हें अपराध-बोध करवाकर अपनी मनचाही चीजें हासिल करती है। चाहे बात आर्थिक मदद की हो या किसी अन्य अनुरोध की, इस रिश्ते में सीमाएं तय करना बेहद जरूरी हो गया है। किसी भी माता-पिता को अपने वयस्क बच्चे के लिए कुछ भी करने पर मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, खासकर तब, जब उन्हें बदले में जरा भी कृतज्ञता न मिले।  - edit@amarujala.com
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