कुछ फिल्मों को छोड़ दें, तो राज कपूर की ज्यादातर फिल्मों के करीब-करीब सभी नायक एक बेहतर मनुष्य हैं। सीधे-सरल। इसके विपरीत पुष्पा का नायक क्या है? वह लूटपाट करता है। हत्याएं करता है। स्मगलिंग करता है। सिगरेट-शराब बेधड़क पीता है। थोड़ा लचक कर चलते हुए जिस तरह व्यवहार करता है, उससे साफ तौर पर मनोरोगी प्रतीत होता है। किए गए अपराधों के प्रति उसमें किसी तरह की आत्मग्लानि नहीं है, बल्कि वह उनमें रस लेता है। स्त्रियों को लेकर उसके मन में कितना सम्मान है, यह उसके नायिका के साथ व्यवहार से समझा जा सकता है।
भारतीय सिनेमा की करुणा से जुगुप्सा तक की यह यात्रा सिर्फ सिनेमा की असफलता की कहानी नहीं है। एक समाज के तौर पर हम किस तरह बदलते चले गए हैं और आज कहां पहुंच गए हैं, उसका भी रूपक है। यह सफर हमने क्रमश: तय किया है। भारतीय सिनेमा के इस पक्ष को लेकर बहुत कुछ लिखा गया है कि जब देश आजाद हुआ तो उसके सामने बड़े सपने थे। उन्हें पूरा करने की हसरत थी। स्वतंत्रता के संघर्ष से गुजरी पीढ़ी के पास अपना आदर्शवाद था। और सिनेमा की कहानियों में समाज का यही जज्बा प्रतिध्वनित हुआ। वक्त बीता। धीरे-धीरे लोगों को समझ में आने लगा कि उनके सपनों का हकीकत में बदलना इतना आसान नहीं है।
स्वप्न भंग के इस दौर में समाज ने वैकल्पिक रास्ते अख्तियार कर लिए। अब सिनेमा की कहानियां भी बदलने लगीं। राजेश खन्ना की रूमानी फिल्मों तक, फिर भी आदर्शवाद का असर कुछ हद तक बचा रहा। लेकिन, एंटी हीरो के तौर पर अमिताभ बच्चन के उदय के साथ ही भारतीय सिनेमा ने एक नई राह पकड़ ली। अब नायक, प्रतिनायक में बदल गया। वह अपराधी की तरह व्यवहार करने लगा। मगर, यहां भी गनीमत थी। नायक के पास अपराध की कोई ठोस वजह होती थी। कुल मिलाकर दर्शकों के समक्ष यही संदेश जाता था कि गलत, गलत है और सही, सही। इसके विपरीत पुष्पा के नायक को अपराध करने के लिए किसी वाजिब वजह की जरूरत नहीं पड़ती। हिंसा उसके लिए आनंद का विषय है। अब खलनायक ही नायक है। नायक और प्रतिनायक की समाज में कहीं कोई जगह नहीं बची है। खलनायक की इतनी व्यापक स्वीकृति एक समाज के तौर पर हमारी असफलता का ही प्रतीक है। अब अहंकारी समाज का यही स्वर है-पुष्पा, झुकेगा नहीं साला!’