यह कोई काल्पनिक कथा नहीं है। यह 2025 का भारत है। लेकिन हम आखिर इस हद तक कैसे पहुंचे? जूलॉजी में स्नातकोत्तर कर रही एक पढ़ी-लिखी युवती और उसकी 18 साल की बहन औसत मध्यमवर्गीय हिंदू परिवार से हंै। उनके पास ऐसी आर्थिक मजबूरी और अस्थिरता नहीं है कि वे ऐसे सिंडिकेट के जाल में फंस जाएं। लेकिन यह स्थिति का केवल सतही विश्लेषण है। इसका उत्तर हमें उनके हताश पिता से पहले ही मिल चुका है, जो अन्य माता-पिता को अपने बच्चों में सही धार्मिक मूल्यों को विकसित करने की चेतावनी देता है। औसत मध्यमवर्गीय परिवार के पास अपने बच्चों को सौंपने के लिए कोई बड़ी विरासत नहीं होती है, इसलिए उनका लक्ष्य होता है कि बच्चों को शिक्षा से लैस किया जाए, ताकि वे जीवन भर सुरक्षित रहें। माता-पिता को लगता है कि यही मूल्य समय की कसौटी पर खरा उतरेगा और उन्हें जीवन के उतार-चढ़ाव से उबारेगा।
मध्यम वर्ग की बेटियों को भी लड़कों की तरह ही पेशेवर रूप से योग्य बनने के लिए प्रेरित किया जाता है, ताकि उन्हें सम्मान और स्वतंत्रता से भरा जीवन जीने का विकल्प मिल सके। इस मामले में माता-पिता ने कोई गलती नहीं की थी। दीपाली (अमीना) एक कोचिंग सेंटर में पढ़ रही थी, जब उसकी मुलाकात समीना से हुई और वह उससे गहरी दोस्ती कर बैठी। समीना घर आती-जाती रहती थी और एक खुशमिजाज और धार्मिक विचारों वाली लड़की थी। चूंकि हिंदू धर्म अन्य सभी धर्मों के प्रति सम्मान रखता है, इसलिए दीपाली के माता-पिता को कोई आपत्ति नहीं थी। यहां तक कि जब समीना ने दीपाली की मां को धर्म परिवर्तन का सुझाव दिया, तो उन्हें चिंता के बजाय थोड़ी खुशी ही हुई। उन्हें इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह कोई सरसरी टिप्पणी नहीं थी, बल्कि उनकी बड़ी बेटी के मन में पहले से ही घर कर रही थी। बेशक इस कहानी की पृष्ठभूमि धार्मिक हो, लेकिन यह कहानी धार्मिक नहीं है, बल्कि यह उन मूल्यों की कहानी है, जो नेकदिल लोगों में भी डगमगाते हैं और जो ऐसी परिस्थितियां पैदा करते हैं। इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, एक समाज के तौर पर हमें इनसे अपने अंदर ही लड़ना होगा।
हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां छवि और सफलता को प्राथमिकता दी जाती है। रिश्ते लगातार क्षणभंगुर होते जा रहे हैं। जैसे-जैसे इंटरनेट के जरिये दुनिया छोटी होती जा रही है, हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों, अपनी सभ्यतागत पहचान और मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं। जब हिंदू समाज यह मानता है कि 2025 में बच्चों की परवरिश का सही तरीका सिर्फ खुलापन ही है, तो हम सांस्कृतिक रूप से अनाथों की एक पीढ़ी तैयार कर रहे हैं। ये लोग दुनिया से तो जुड़े होते हैं, लेकिन अपनी जड़ों से कटे होते हैं।
युवा भले ही यह मानने से इन्कार कर दें कि उन्हें क्या करना है, पर वे एक निश्चित ढांचे की चाहत भी रखते हैं। और अक्सर ढांचे को ही नियम समझ लिया जाता है-घर लौटने की समय-सीमा, प्रेमी/प्रेमिका का न होना, पढ़ाई का समय वगैरह। ये सब ऊपर से थोपे हुए हैं, असली ढांचा हमारे भीतर से और हमारे सांस्कृतिक मूल्यों की समझ से आता है। यहां हम विफल रहे हैं और आगे भी विफल होते रहेंगे, इसीलिए आगरा जैसे मामले सामने आते हैं। और यह विडंबना ही है, क्योंकि हम एकमात्र बौद्धिक, दार्शनिक, धार्मिक व्यवस्था हैं, जिसकी हमेशा से एक आंतरिक संरचना रही है, और उसे धर्म कहते हैं। और धर्म ने हमेशा से यह आंतरिक संरचना प्रदान की है। जब किसी बच्चे में धार्मिक मूल्यों को कर्मकांडों के जरिये नहीं, बल्कि जीवन जीने के तरीके के रूप में विकसित किया जाता है, तो उनकी आंतरिक स्पष्टता ही वह दिशासूचक बन जाती है, जो जीवन को सच्ची सफलता की ओर ले जाती है।
सेवा, संकल्प, स्वाभिमान और श्रद्धा के मूल्य ऐसे कवच हैं, जो व्यक्ति को दिखावटी जीवनशैली और जहरीली विचारधाराओं से बचाते हैं। लेकिन हमने अपनी संस्कृति के इस शक्तिशाली पहलू को व्यवस्थित रूप से नजरअंदाज कर दिया है। हमने भगवद्गीता के बजाय शेक्सपियर को प्राथमिकता दी है। आधुनिक दिखने के लिए हम जलवायु परिवर्तन पर तो चर्चा करेंगे, लेकिन प्रकृति या पंचभूत पर नहीं। नतीजतन, हमारे पास एक ऐसी पीढ़ी है, जो सांस्कृतिक रूप से अनाथ है और जो छल-कपट के लिए तैयार व तत्पर है। हिंदुओं को कट्टरपंथ का मुकाबला कट्टरपंथ से करने की जरूरत नहीं है। हम एक ऐसी परंपरा से जुड़े हैं, जो हजारों वर्षों से चली आ रही है।
हमें बस अपने मूल्यों और धर्म का सक्रिय संरक्षक बनना है। पिछली पीढ़ियां गुलामी और उपनिवेशवाद के कठिन दौर में कहीं ज्यादा संरक्षक रही हैं। अब एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी धर्म-आधारित पहचान को बचाएं। जब एक दीपाली अमीना बन कर इतनी कट्टरपंथी हो जाती है कि वह मूर्तियों और उन हिंदू रीति-रिवाजों को बर्दाश्त नहीं कर पाती, जिनमें वह पली-बढ़ी थी, तो हमें एहसास होता है कि धर्म का प्रचार-प्रसार कितना आसान हो गया है। लेकिन कई मायनों में अब बहुत देर हो चुकी है। हमें अपनी बेटियों की सुरक्षा के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा समय रहते उठाए गए मिशन अस्मिता जैसे कदमों की सराहना करनी चाहिए। और गहराई से यह भी स्वीकार करना चाहिए कि सुरक्षा का असली पाठ घर से ही शुरू होता है, जो धर्म नामक आंतरिक कवच में से एक है।