राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) प्रदत्त निर्देशों के बाद केंद्रीय भू-जल बोर्ड ने गत आठ अक्तूबर को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पीने के काम आने वाले भू-जल की बर्बादी व दुरुपयोग रोकने के लिए 1986 के पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के दंडात्मक प्रावधानों पर सख्ती से अमल के निर्देश दिए हैं। यह देर से उठाया गया अत्यंत आवश्यक सामयिक कदम है। देर से, इसलिए क्योंकि एनजीटी ने अक्तूबर, 2019 में ही भू-जल की ऐसी बर्बादी रोकने के लिए ऐसे निर्देश दिए थे। एनजीटी की एक बेंच ने तो जलशक्ति मंत्रालय को यहां तक कहा था कि केवल पत्र लिखने भर से काम नहीं चलेगा, पानी की बर्बादी रोकने और जनता के भरोसे पर खरा उतरने के लिए दंडात्मक कार्रवाइयां भी करनी होंगी।
प्रासंगिक अधिनियम के तहत कोई भी पीने के लिए उपयोगी भू-जल की बर्बादी और उसका दुरुपयोग नहीं कर सकता। देश में करीब आधी जल आपूर्ति भूमिगत जल से ही होती है। देश में विभिन्न उपयोगों के लिए खपत में आए कुल जल का 70 प्रतिशत भाग भू-जल का ही होता है। नलों से आपूर्ति न होने से गांवों की 85 प्रतिशत पानी की जरूरत भू-जल से पूरी होती है। औसतन ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की 80 प्रतिशत घरेलू जरूरतें भू-जल से ही पूरी होती हैं। किंतु यह भी साफ दिखता है कि घरों में जो पीने का पानी नलकूपों से पहुंचाया जाता है, उसकी बड़ी मात्रा कपड़ों की धुलाई, वाहनों की सफाई, फुलवारी सींचने, निर्माण कार्यों व शौचालय फ्लश करने में खर्च हो जाती है।
अनुमानतः अमेरिका व चीन से भी ज्यादा दुनिया में सर्वाधिक भू-जल का उपयोग भारत में होता है। विश्व में प्रतिवर्ष भू-जल उपयोग में भारत की हिस्सेदारी लगभग 25 प्रतिशत की है। यदि भू-जल में बहाव के साथ प्रदूषण न पहुंचे, तो उसे अपेक्षाकृत शुद्ध होना चाहिए। प्रदूषित बहते नदियों-नालों से आसपास की भूमि के भू-जल स्रोतों के भी प्रदूषित होने की आशंका रहती है। शौचालयों के गड्ढों से भी भूमिगत जल भंडारों के प्रदूषित होने की आशंका रहती है। इस कारण अब चिह्नित हैंडपंपों पर यह चेतावनी देने के लिए निशान भी लगाए जा रहे हैं कि इनका पानी पीना घातक हो सकता है।
हमारे साफ जल का लगभग 90 प्रतिशत कृषि कार्यों में लगता है। आजादी के समय खेती में जितने भू-जल का उपयोग होता था, आज उससे दोगुना जल का उपयोग होता है। वर्तमान में नहरों से सिंचाई का प्रतिशत घटता जा रहा है और नलकूपों से सिंचाई का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है। सिंचाई के लिए काफी सस्ते में बिजली मिलने से भी खेती में जल के किफायती उपयोग पर ध्यान नहीं दिया गया। इससे भू-जल का स्तर गहराइयों में भी गया और कम भी हुआ, जिसके चलते नलकूप मृतप्राय हो गए। यह न भूलें कि वैज्ञानिकों की दृष्टि में जल एक खनिज है। भूमिगत जल को जब हम जमीन की सैकड़ों फीट गहराई से निकालते हैं, तो यह एक तरह से जल का खनन करना ही हो जाता है। कहीं-कहीं और कभी-कभी तो यह दोहन इतना ज्यादा हो जाता है कि सोने के अंडे के लालच में मुर्गी को ही मार दिया जाता है। दोहन व जलवायु बदलाव के कारणों के अलावा भी सीमेंट-कंकरीट से बनी सड़कों, भवनों आदि के विस्तार से बरसाती पानी के भू-जल भंडारों में पहुंचने की राह मुश्किल होने से खासकर नगरों, महानगरों में भूमिगत जल स्तर बहुत गहराइयों में पहुंच गया है।
नीति आयोग भी आशंका व्यक्त कर चुका है कि देश में भू-जल दोहन की वर्तमान प्रवृति बनी रही, तो 2030 तक 40 प्रतिशत के करीब ऐसे लोग हो जाएंगे, जिन्हें पानी की आवश्यक उपलब्धता से वंचित होना पड़ेगा। सोचिए, यह उस मिशन से कितना उलट है, जो 2024 तक हर घर में नल से पेयजल पहुंचाने की बात करता है। चिंता यह भी है कि इस समय भी देश में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता दो प्रतिशत की दर से घट रही है। अतः आज व्यावसायिक लड़ाइयों के बीच भू-माफिया की ही तरह भू-जल माफिया भी चर्चा में रहते हैं। भू-जल प्रबंधन बहुत ही आवश्यक है, किंतु यह जानना भी अहम है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की स्मृति में अटल भू-जल योजना शुरू की गई है, जरूरत इसकी सार्थकता को समझने की है।